राष्ट्रीय / पश्चिम बंगाल | अरिंदम बनर्जी | ABC NATIONAL NEWS | 10 मई 2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद राज्य में राजनीतिक तनाव और हिंसा की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। इसी बीच मुर्शिदाबाद के जियागंज में रूसी क्रांति के महानायक व्लादिमीर लेनिन की प्रतिमा तोड़े जाने की घटना ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं और एक बार फिर सवाल उठने लगा है कि आखिर भारत में लेनिन की प्रतिमाएं क्यों स्थापित की गईं और उनका भारत से क्या संबंध था।
कौन थे व्लादिमीर लेनिन?
व्लादिमीर इलिच लेनिन रूस की बोल्शेविक क्रांति के प्रमुख नेता थे। उन्होंने 1917 की रूसी क्रांति का नेतृत्व किया और दुनिया के पहले समाजवादी शासन की स्थापना की। लेनिन को साम्यवाद और मजदूर आंदोलनों का सबसे बड़ा वैचारिक चेहरा माना जाता है। सोवियत संघ की स्थापना में उनकी केंद्रीय भूमिका रही।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से क्या था संबंध?
इतिहासकारों के अनुसार लेनिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष नहीं, बल्कि उपनिवेशवाद विरोधी वैश्विक आंदोलन का हिस्सा मानते थे। उन्होंने कई बार भारत की जनता और क्रांतिकारियों के संघर्ष का समर्थन किया था।
बताया जाता है कि लेनिन ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की खुलकर आलोचना की थी और भारत को औपनिवेशिक शोषण का सबसे बड़ा उदाहरण बताया था। रूसी क्रांति के बाद सोवियत नेतृत्व ने एशियाई देशों, खासकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों में गहरी रुचि दिखाई।
भारतीय क्रांतिकारियों पर पड़ा प्रभाव
भगत सिंह, एम.एन. रॉय, सुभाष चंद्र बोस और कई वामपंथी विचारकों पर लेनिन के विचारों का प्रभाव माना जाता है। भगत सिंह जेल में लेनिन की जीवनी पढ़ते थे। कहा जाता है कि फांसी से पहले भी वे लेनिन पर आधारित पुस्तक पढ़ रहे थे।
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की वैचारिक नींव भी काफी हद तक लेनिन और रूसी क्रांति से प्रभावित रही। 1920 के दशक में भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं और सोवियत रूस के बीच वैचारिक संपर्क बढ़े थे।
टैगोर और नेहरू भी गए थे सोवियत संघ
भारत के कई बड़े नेताओं और बुद्धिजीवियों ने भी सोवियत मॉडल में रुचि दिखाई थी। रवींद्रनाथ टैगोर और जवाहरलाल नेहरू ने सोवियत संघ की यात्रा की थी। नेहरू ने अपनी कई रचनाओं में रूस के औद्योगिक और सामाजिक बदलावों का उल्लेख किया था।
बंगाल में क्यों हैं लेनिन की प्रतिमाएं?
पश्चिम बंगाल लंबे समय तक वामपंथी राजनीति का गढ़ रहा है। 1977 से 2011 तक राज्य में वाम मोर्चा की सरकार रही। इसी दौरान लेनिन, मार्क्स और अन्य वामपंथी नेताओं की प्रतिमाएं राज्य के कई हिस्सों में स्थापित की गईं। वामपंथी दल इन्हें मजदूर आंदोलन, सामाजिक न्याय और साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष के प्रतीक के रूप में देखते रहे हैं।
मूर्ति तोड़े जाने पर बढ़ा विवाद
मुर्शिदाबाद में लेनिन की प्रतिमा गिराए जाने की घटना के बाद वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस ने बीजेपी समर्थकों पर हमला बोला है। वहीं कुछ दक्षिणपंथी संगठनों का कहना है कि भारत में विदेशी नेताओं की मूर्तियों की जरूरत नहीं है। इस मुद्दे पर सोशल मीडिया में भी तीखी बहस छिड़ गई है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद वैचारिक संघर्ष अब प्रतीकों और इतिहास तक पहुंच चुका है। लेनिन की प्रतिमा पर हमला केवल एक मूर्ति विवाद नहीं, बल्कि बंगाल की बदलती राजनीतिक संस्कृति का संकेत माना जा रहा है।




