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ममता तब जागीं जब चिड़िया चुग गई खेत: क्या बंगाल की हार ने बदल दी दीदी की राजनीति?

ओपिनियन | राष्ट्रीय / पश्चिम बंगाल | प्रणव प्रियदर्शी | ABC NATIONAL NEWS | 10 मई 2026

राजनीति में समय सबसे बड़ा शिक्षक होता है। जो नेता समय की नब्ज पहचान लेता है, वही लंबे समय तक सत्ता में टिकता है। लेकिन जो नेता अपनी राजनीतिक ताकत के भरोसे सहयोगियों को कमजोर समझने लगता है, उसे कभी-कभी जनता ऐसा झटका देती है कि पूरी रणनीति बदलनी पड़ जाती है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी के साथ शायद यही हुआ है।

करीब डेढ़ दशक तक बंगाल की निर्विवाद नेता रहीं ममता बनर्जी आज उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही हैं, जहां उन्हें उन्हीं दलों की जरूरत महसूस हो रही है जिन्हें कभी उन्होंने राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बताने की कोशिश की थी। कांग्रेस और वाम दलों से दूरी बनाकर “अकेले लड़ो” की रणनीति अपनाने वाली तृणमूल कांग्रेस अब बीजेपी के खिलाफ संयुक्त मोर्चे की बात कर रही है। सवाल यही है कि क्या यह राजनीतिक परिपक्वता है या फिर हार के बाद मजबूरी?

जब बीजेपी बंगाल में संघर्ष कर रही थी, तब ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक मॉडल “मैं ही विपक्ष हूं, मैं ही विकल्प हूं” पर आधारित था। उन्होंने वाम दलों को लगभग खत्म कर दिया और कांग्रेस को भी राज्य की राजनीति के हाशिए पर धकेल दिया। लेकिन इसी प्रक्रिया में विपक्षी वोटों का ऐसा बिखराव हुआ जिसका सबसे बड़ा लाभ अंततः बीजेपी को मिला। बीजेपी ने खुद को एकमात्र मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित किया और 2026 आते-आते वही पार्टी बंगाल की सत्ता तक पहुंच गई।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस दिन शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, उसी दिन ममता बनर्जी विपक्षी एकता का संदेश दे रही थीं। यह दृश्य सिर्फ राजनीतिक नहीं, प्रतीकात्मक भी था। एक तरफ सत्ता का हस्तांतरण हो रहा था, दूसरी तरफ हार के बाद नई रणनीति की घोषणा। लेकिन राजनीति में सवाल नीयत और समय दोनों का होता है। अगर यही अपील चुनाव से पहले की गई होती, तो शायद तस्वीर अलग होती।

दरअसल, बंगाल चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह विपक्षी राजनीति की सबसे बड़ी सीख भी बन गया। बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में विपक्षी दल अगर एक-दूसरे को खत्म करने में लगे रहेंगे, तो अंततः फायदा बीजेपी को ही मिलेगा। यही बात देश के दूसरे राज्यों में भी बार-बार देखने को मिली है। लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी शायद इस वास्तविकता को स्वीकार करने में देर कर गईं।

अब ममता बनर्जी कह रही हैं कि वामपंथी, अति-वामपंथी और सभी बीजेपी विरोधी ताकतें एक मंच पर आएं। लेकिन सवाल उठता है कि क्या जिन दलों को वर्षों तक राजनीतिक दुश्मन बताया गया, वे इतनी आसानी से भरोसा कर लेंगे? क्या कांग्रेस और CPI(M) फिर से तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार करेंगे? और सबसे बड़ा सवाल—क्या बंगाल की जनता इस नई राजनीतिक दोस्ती को सहज रूप से स्वीकार करेगी?

बीजेपी के लिए यह पूरा घटनाक्रम राजनीतिक अवसर बन चुका है। पार्टी अब यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि ममता बनर्जी की राजनीति सिर्फ सत्ता तक सीमित थी और जैसे ही सत्ता गई, उन्हें सहयोगियों की याद आने लगी। बीजेपी यह भी कह रही है कि जनता ने “एकछत्र राजनीति” को नकार दिया है और अब बंगाल “डबल इंजन” मॉडल चाहता है।

हालांकि यह भी सच है कि भारतीय राजनीति में कोई भी हार स्थायी नहीं होती। ममता बनर्जी जैसी जुझारू नेता को कम आंकना भी बड़ी भूल होगी। उन्होंने पहले भी असंभव दिखने वाली लड़ाइयां जीती हैं। लेकिन इस बार चुनौती अलग है। अब उनके सामने सिर्फ बीजेपी नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता बचाने की लड़ाई भी है।

राजनीति में गठबंधन सिर्फ सीटों का गणित नहीं होता, भरोसे का विज्ञान भी होता है। और भरोसा अचानक पैदा नहीं होता। उसे बनाने में समय लगता है। ममता बनर्जी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या वे उन दलों का विश्वास दोबारा जीत पाएंगी जिन्हें कभी उन्होंने बंगाल की राजनीति से बाहर करने की कोशिश की थी।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि बंगाल की हार ने ममता बनर्जी की राजनीति की दिशा बदल दी है। लेकिन यह बदलाव बहुत देर से आया या सही समय पर — इसका फैसला आने वाले चुनाव करेंगे।

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