राष्ट्रीय | अवधेश झा | ABC NATIONAL NEWS | 10 मई 2026
दिल्ली विकास प्राधिकरण यानी DDA की एक बड़ी लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए उसे 165 करोड़ रुपये ब्याज समेत लौटाने का आदेश दिया है। मामला उस कमर्शियल जमीन से जुड़ा है जिसे DDA ने वर्ष 2007 में अपनी बताकर नीलामी में बेच दिया था, लेकिन बाद में अदालत में पता चला कि जमीन का अधिग्रहण ही वैध नहीं था। यानी जिस जमीन को DDA ने करोड़ों रुपये लेकर बेचा, उस पर उसका कानूनी अधिकार ही नहीं था। अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि सरकारी एजेंसियां जनता या कंपनियों को गलत तरीके से बेची गई संपत्ति के लिए जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं। यह पूरा मामला दक्षिण-पूर्व दिल्ली के जसोला इलाके के एक बड़े कमर्शियल प्लॉट से जुड़ा है। DDA ने 2007 में सार्वजनिक नीलामी कर यह प्लॉट बेचा था। रिलायंस एमिनेंट ट्रेडिंग एंड कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी ने करीब 165 करोड़ रुपये देकर यह जमीन खरीदी। कंपनी ने स्टांप ड्यूटी, ट्रांसफर ड्यूटी और अन्य कर भी जमा किए और 2008 में रजिस्टर्ड कन्वेयंस डीड भी उसके नाम हो गई।
लेकिन कई साल बाद असली जमीन मालिक सिमला देवी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दावा किया कि सरकार ने जमीन अधिग्रहण के दौरान उन्हें मुआवजा नहीं दिया था, इसलिए पूरा अधिग्रहण ही अवैध है। दिल्ली हाई कोर्ट ने 2016 में इस दलील को सही माना और अधिग्रहण रद्द कर दिया। बाद में 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके साथ ही जमीन पर DDA का अधिकार समाप्त हो गया।
सबसे बड़ी बात यह रही कि जिस कंपनी ने करोड़ों रुपये देकर जमीन खरीदी थी, उसे लंबे समय तक इस कानूनी विवाद की पूरी जानकारी तक नहीं थी। बाद में DDA ने कंपनी से कहा कि यदि जमीन चाहिए तो नए अधिग्रहण के लिए अतिरिक्त पैसा देना होगा। यानी एक ही जमीन के लिए दोबारा भुगतान करने की बात कही गई। इसके बाद कंपनी ने पैसा वापस मांगते हुए अदालत का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में DDA की दलीलों को “काल्पनिक” और “भ्रमित करने वाला” बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि जब जमीन पर DDA का कोई अधिकार ही नहीं बचा, तो वह खरीदार से कब्जा लौटाने जैसी शर्तें नहीं रख सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि खरीदार ने पूरी प्रक्रिया सरकार और DDA पर भरोसा करके पूरी की थी, इसलिए उसे नुकसान उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि DDA कंपनी को 164.91 करोड़ रुपये पर जुलाई 2007 से 7.5 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ भुगतान करे। बताया जा रहा है कि ब्याज जोड़ने के बाद कुल रकम लगभग 400 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है। अदालत ने DDA को आठ सप्ताह के भीतर बाकी भुगतान करने का निर्देश दिया है।
कानूनी विशेषज्ञ इस फैसले को बेहद अहम मान रहे हैं। उनका कहना है कि यह फैसला उन सभी लोगों और कंपनियों के लिए बड़ी राहत है जो सरकारी एजेंसियों की नीलामी में भरोसे के साथ संपत्ति खरीदते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि अगर सरकार या उसकी एजेंसियां बिना वैध अधिकार के जमीन बेचती हैं, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी होगी।




