ओपिनियन | प्रो शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री एवं राजनीतिक विशेषज्ञ | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता/ नई दिल्ली | 4 मई 2026
पश्चिम बंगाल में आखिर “खेला” हो ही गया। बीजेपी ने इसके लिए एक दशक इंतजार किया और जो वह चाहते थे, वह हासिल कर लिया। बंगाल गेरुआ हो गया और बीजेपी की सरकार बन गई। मुख्यमंत्री कौन होगा—इसका फैसला तो हो ही जाएगा, ऐलान होना बाकी है। अखबारें अटकलें लगाती रहेंगी, दो-एक दिन में स्थिति साफ हो जाएगी। लेकिन असली सवाल सरकार बनने का नहीं है। सवाल यह है कि Mamata Banerjee जमीन क्यों खो बैठीं। क्या वे लोकप्रिय नहीं थीं? या लोकप्रियता खत्म हो चुकी थी? यह बात तो उनका विरोधी भी मानने को तैयार नहीं है। वह जनमानस से जुड़ी थीं—यह बात उनके विरोधी भी मानते हैं। कार्यकर्ताओं के दिलो-दिमाग पर छाई रहीं और आज भी लोगों से उनका जुड़ाव बना हुआ है। फिर ऐसा क्या हुआ कि बिना कुछ खोए भी उन्होंने सत्ता गंवा दी—यही समझना जरूरी है।
2021 के चुनाव के बाद बीजेपी लगातार कैंपेन मोड में आ गई। ममता और तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के खिलाफ लगातार आरोप लगाए गए। बंगाल में शिक्षकों की भर्ती को लेकर घोटाले की बात उठी। अदालत के जरिए करीब 26,000 शिक्षकों की नौकरियां चली गईं। शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी जेल भेजे गए। कई अन्य मामले भी इसी तरह सामने आए और जोरदार प्रचार हुआ कि ममता सरकार भ्रष्ट है। जिनकी नौकरी गई, वे केवल दुखी ही नहीं हुए, बल्कि उन्हें लगा कि सरकार प्रशासन संभालने में विफल है।
इन घटनाओं से जुड़ी न्यायिक प्रक्रियाओं और फैसलों ने भी राजनीतिक असर डाला। पार्थ चटर्जी को बिना शर्त जमानत तो मिली, लेकिन जिन लोगों की नौकरियां गईं, उनकी बहाली नहीं हो सकी। जनता परेशान रही और असंतोष बढ़ता गया।
केंद्र और राज्य के बीच टकराव भी एक अहम कारण बना। मनरेगा जैसी योजनाओं के फंड को लेकर विवाद हुआ। केंद्र ने अनियमितताओं का हवाला देते हुए भुगतान रोका, जबकि राज्य सरकार ने आरोपों को खारिज किया। इसका असर लाखों मजदूरों पर पड़ा, जिन्हें समय पर मजदूरी नहीं मिली और स्वाभाविक रूप से नाराजगी बढ़ी।
इसके अलावा अभिषेक बनर्जी समेत कई नेताओं के खिलाफ जांच एजेंसियों की कार्रवाई ने भी पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाया। भले ही ठोस सबूत सामने न आए हों, लेकिन लगातार चल रहे प्रचार ने जनमानस में संदेह जरूर पैदा किया। राजनीति में बदनाम होना, कई बार दोषी होने से भी ज्यादा नुकसानदेह साबित होता है।
तृणमूल कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ताओं पर वसूली और अन्य आरोप भी लगे, जिसका खामियाजा अंततः ममता बनर्जी को भुगतना पड़ा।
इसी के साथ वोटर लिस्ट के गहन पुनरीक्षण का मुद्दा भी सामने आया, जिसमें लाखों नाम कटने की बात कही गई। तृणमूल का दावा है कि इससे उनके वोटर प्रभावित हुए। पिछले चुनाव में भाजपा और तृणमूल के वोटों में लगभग 63 लाख का अंतर था, जबकि नाम कटने का आंकड़ा 91 लाख बताया गया। पार्टी का कहना है कि “खेल” यहीं हो गया। अब तक बहुत कम नाम बहाल हो पाए हैं और अदालत से भी बड़ी राहत नहीं मिली।
नतीजा सामने है—चुनाव में ममता हार गईं और Narendra Modi के नेतृत्व में भाजपा जीत गई।
कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि अगर “लक्ष्मी भंडार” योजना के तहत दी जाने वाली राशि 1500 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये कर दी जाती, तो महिलाओं का एक वर्ग भाजपा की ओर न जाता। बेरोजगारी और आर्थिक दबाव के बीच ऐसी योजनाएं चुनावी परिणामों को प्रभावित करती हैं।
अब सवाल यह है कि क्या तृणमूल कांग्रेस समाप्त हो जाएगी? शायद नहीं। लेकिन पार्टी के भीतर दबाव जरूर बढ़ेगा। नेताओं के दल बदलने की आशंका बनी रहेगी और अभिषेक बनर्जी पर भी दबाव बढ़ सकता है।
आखिरकार, यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि ममता बनर्जी अपने संगठन और नेताओं को किस तरह संभालती हैं। एक बात साफ है—खेल अभी खत्म नहीं हुआ है, बल्कि आगे भी चलता रहेगा। जनता को अभी और इंतजार करना होगा।




