राजनीति | महेंद्र सिंह | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता/नई दिल्ली | 5 मई 2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद राज्य की राजनीति में एक बार फिर Mamata Banerjee और Indian National Congress के बीच रिश्तों को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। राजनीतिक हलकों में यह सवाल तेज़ी से उठ रहा है कि जिस कांग्रेस ने ममता बनर्जी को शुरुआती राजनीतिक मंच दिया, उसी से अलग होकर All India Trinamool Congress बनाने के बाद उन्होंने अपने पुराने सहयोगी के साथ किस तरह की राजनीति की। विश्लेषकों का मानना है कि यह रिश्ता शुरू से ही सहयोग और प्रतिस्पर्धा के बीच झूलता रहा, लेकिन समय के साथ इसमें अविश्वास और टकराव अधिक स्पष्ट होता गया।
राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर डालें तो वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का गठबंधन बेहद सफल रहा था और इसी के चलते ममता बनर्जी केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका में आईं। इसके बाद 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में दोनों दलों ने मिलकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और 34 वर्षों से सत्ता में रही वाम सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। उस दौर में कांग्रेस न केवल गठबंधन की साझेदार थी, बल्कि राज्य सरकार में भी उसकी भागीदारी थी। लेकिन यह समीकरण ज्यादा लंबे समय तक टिक नहीं सका और 2012 में तृणमूल कांग्रेस द्वारा यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद दोनों दलों के रिश्तों में निर्णायक दरार आ गई।
इसके बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का दबदबा लगातार बढ़ता गया, जबकि कांग्रेस का संगठनात्मक आधार कमजोर पड़ता गया। आरोप यह भी लगते रहे कि राज्य में कांग्रेस के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने तृणमूल कांग्रेस का रुख किया, जिससे कांग्रेस की जमीनी पकड़ और सीमित हो गई। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकजुटता की कोशिशों के बावजूद INDIA bloc के भीतर भी दोनों दलों के बीच तालमेल की कमी कई मौकों पर सामने आई, जिससे संयुक्त रणनीति पर सवाल उठे।
2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में सीट बंटवारे को लेकर सहमति न बन पाना और तृणमूल कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ना इस दूरी को और स्पष्ट करता है। इसके बाद भी कई मौकों पर दोनों दलों के नेताओं के बीच बयानबाजी ने रिश्तों में कड़वाहट को सार्वजनिक रूप से उजागर किया। अब 2026 के चुनावी नतीजों के संदर्भ में इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखा जा रहा है, जहां राजनीतिक जानकार मानते हैं कि लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों और रणनीतिक टकराव का असर चुनावी परिणामों पर भी पड़ा है।
इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य के बीच Rahul Gandhi द्वारा संसद में उठाए गए चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों ने भी विपक्षी राजनीति की दिशा को प्रभावित किया। कांग्रेस ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची से जुड़े सवालों को जोरदार तरीके से उठाया, लेकिन विपक्षी दलों के बीच इस मुद्दे पर एकजुटता साफ तौर पर नहीं दिखी। Akhilesh Yadav की Samajwadi Party और All India Trinamool Congress ने इस बहस में सीमित भागीदारी दिखाई, जिससे विपक्षी गठबंधन के भीतर मतभेद और स्पष्ट हो गए।
ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने संसद के समय का उपयोग अन्य मुद्दों पर बहस करने के लिए चुना और Mallikarjun Kharge तथा राहुल गांधी की गुजारिश के बावजूद इस विशेष मुद्दे पर कांग्रेस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सदन के बहिष्कार या हंगामे में शामिल होने से दूरी बनाए रखी।
इसके बाद राजनीतिक समीकरण और स्पष्ट होते गए। समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस की अनिच्छा के कारण INDIA bloc के भीतर एकरूपता नहीं बन पाई। इस बिखराव का फायदा उठाते हुए Bharatiya Janata Party ने बहस का रुख बदलते हुए ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ और अन्य ऐतिहासिक मुद्दों को केंद्र में ला दिया, जिससे विपक्ष की संयुक्त रणनीति कमजोर पड़ती नजर आई।
अब जब बंगाल 2026 के नतीजे सामने आ चुके हैं, तो यह सवाल और भी तेज हो गया है कि क्या विपक्षी गठबंधन की कमजोरी और आपसी अविश्वास ने चुनावी परिणामों को प्रभावित किया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन मुद्दों को उस समय पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया, वही बाद में चुनावी पराजय के संदर्भ में उठाए जाने लगे।
फिलहाल, बंगाल की राजनीति में यह बहस अपने चरम पर है कि क्या यह केवल एक चुनावी हार है या लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक फैसलों का परिणाम। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करते हैं या राजनीतिक दूरी और गहराती है।



