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‘जैसे किसी आतंकी को गिरफ्तार करना हो…’ सुप्रीम कोर्ट में पवन खेड़ा की जमानत याचिका पर बड़ी बहस, फैसला सुरक्षित

राष्ट्रीय | अवधेश झा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 30 अप्रैल 2026

रिनिकी भुइयां पासपोर्ट विवाद में कांग्रेस नेता की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई पूरी, दोनों पक्षों ने रखे कड़े तर्क

रिनिकी भुइयां पासपोर्ट मामले में कांग्रेस नेता Pawan Khera की अग्रिम जमानत याचिका पर गुरुवार को Supreme Court of India में हुई सुनवाई के दौरान माहौल काफी गरम रहा। दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई और लंबी दलीलों के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। अब इस मामले में अंतिम निर्णय का इंतजार है, जिस पर राजनीतिक और कानूनी हलकों की नजरें टिकी हुई हैं।

सुनवाई के दौरान पवन खेड़ा की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने गिरफ्तारी की आशंका पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिस तरह की कार्रवाई की जा रही है, वह “ऐसी लगती है जैसे किसी आतंकी को गिरफ्तार करने की तैयारी हो।” बचाव पक्ष ने अदालत के सामने यह दलील रखी कि पूरे मामले में आपराधिक मंशा का कोई ठोस आधार नहीं है और यह कार्रवाई राजनीतिक द्वेष से प्रेरित नजर आती है। उनका कहना था कि जांच एजेंसियों का रवैया जरूरत से ज्यादा सख्त और असामान्य है।

वहीं सरकारी पक्ष ने इन दलीलों का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि मामला गंभीर है और जांच एजेंसियों को अपना काम करने दिया जाना चाहिए। सरकार की ओर से अदालत में यह भी कहा गया कि कानून के सामने सभी बराबर हैं और जांच में सहयोग करना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को ध्यान से सुना और कई अहम सवाल भी उठाए। न्यायालय ने यह जानना चाहा कि क्या इस मामले में गिरफ्तारी तत्काल जरूरी है या जांच बिना गिरफ्तारी के भी आगे बढ़ सकती है। कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जांच के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है।

इस मामले की पृष्ठभूमि रिनिकी भुइयां के पासपोर्ट से जुड़े विवाद से जुड़ी है, जिसमें दस्तावेजों और प्रक्रिया को लेकर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। इसी मामले में पवन खेड़ा का नाम सामने आने के बाद उन्होंने गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

अब फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर टिकी हैं। यह फैसला न सिर्फ पवन खेड़ा के लिए अहम होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों की भूमिका और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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