देश | अवधेश झा | ABC NATIONAL NEWS | प्रयागराज | 30 अप्रैल 2026
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि आयोग कई मामलों में असमान तरीके से कार्रवाई करता है। अदालत ने कहा कि मुस्लिम समुदाय पर अत्याचार या लिंचिंग जैसे गंभीर मामलों में NHRC स्वतः संज्ञान नहीं लेता, जबकि अन्य मामलों में वह तुरंत सक्रिय हो जाता है।
यह टिप्पणी जस्टिस अतुल श्रीधरन की बेंच ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने साफ कहा कि NHRC की भूमिका सीमित है और वह अदालत नहीं है, इसलिए उसे अपनी अधिकार सीमा में रहकर ही काम करना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि आयोग को हर मामले में एक समान और निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने NHRC द्वारा 558 मदरसों की जांच के आदेश पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का आदेश देना NHRC के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। अदालत के अनुसार, ऐसे संवेदनशील और व्यापक मामलों की सुनवाई और जांच का अधिकार संवैधानिक अदालतों के पास ही होता है, न कि किसी आयोग के पास।
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि NHRC को अपनी सीमाएं समझनी होंगी और किसी भी मामले में अति सक्रियता दिखाने से बचना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अगर आयोग अपनी सीमाओं से बाहर जाकर काम करेगा, तो इससे न्यायिक व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि मानवाधिकार से जुड़े मामलों में निष्पक्षता बेहद जरूरी है। अगर किसी एक वर्ग से जुड़े मामलों में तत्परता दिखाई जाती है और दूसरे वर्ग के मामलों में चुप्पी रहती है, तो इससे न्याय की भावना कमजोर होती है।
इस टिप्पणी के बाद NHRC की भूमिका और उसके काम करने के तरीके पर एक नई बहस शुरू हो गई है। कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत की यह टिप्पणी आयोग के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि उसे अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर रहकर ही काम करना चाहिए और हर मामले में समान दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन सभी संस्थाओं के लिए एक संकेत है जो मानवाधिकार से जुड़े मामलों में काम करती हैं। अदालत ने साफ कर दिया है कि कानून और अधिकारों की सीमाओं का पालन करना हर संस्था के लिए जरूरी है, ताकि न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बना रहे।




