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सुपरपावर की सुरक्षा पर सवाल: ईरान तनाव के बीच पेंटागन का बड़ा कबूलनामा—हाइपरसोनिक मिसाइलों के सामने अमेरिका लाचार

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दुनिया | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 29 अप्रैल 2026

दुनिया की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति माने जाने वाले अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था पर उस वक्त गंभीर सवाल खड़े हो गए, जब अमेरिकी रक्षा मंत्रालय Pentagon के एक वरिष्ठ अधिकारी ने खुले मंच पर स्वीकार किया कि मौजूदा समय में अमेरिका के पास हाइपरसोनिक हथियारों और उन्नत क्रूज मिसाइलों से प्रभावी बचाव का कोई भरोसेमंद सिस्टम मौजूद नहीं है। यह कबूलनामा अमेरिकी सीनेट की आर्म्ड सर्विसेज कमेटी के सामने हुई सुनवाई के दौरान सामने आया, जिसने वैश्विक रणनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। खास बात यह है कि यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव—खासकर Iran से जुड़े हालात—पहले ही दुनिया को अस्थिर बनाए हुए हैं और महाशक्तियों के बीच हथियारों की नई दौड़ तेज़ होती जा रही है।

सुनवाई के दौरान Mark Berkowitz ने बेहद साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका की मौजूदा मिसाइल डिफेंस प्रणाली सीमित और एक-स्तरीय है, जिसे मुख्य रूप से पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइल खतरों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह सिस्टम खास तौर पर छोटे पैमाने के हमलों—जैसे उत्तर कोरिया से संभावित खतरे—के लिए डिजाइन किया गया था, लेकिन अब युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज के खतरे पारंपरिक नहीं हैं, बल्कि ऐसे हथियारों से जुड़े हैं जो रडार की पकड़ से बाहर रहते हैं और अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए रास्ता बदल सकते हैं।

बेरकोविट्ज ने जिन “नॉन-बैलिस्टिक खतरों” का जिक्र किया, उनमें हाइपरसोनिक मिसाइलें, लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलें और स्टील्थ ड्रोन शामिल हैं। ये हथियार न केवल बेहद तेज़ होते हैं, बल्कि उड़ान के दौरान दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना लगभग असंभव हो जाता है। यही कारण है कि मौजूदा अमेरिकी डिफेंस सिस्टम इनसे निपटने में नाकाम साबित हो रहा है। यह बयान इस बात की पुष्टि करता है कि आधुनिक युद्ध अब पारंपरिक ताकत का नहीं, बल्कि तकनीकी श्रेष्ठता और गति का खेल बन चुका है, जहां कुछ सेकंड की देरी भी भारी पड़ सकती है।

हाइपरसोनिक हथियारों को लेकर सबसे बड़ी चिंता उनकी गति और अनिश्चित मार्ग है। ये मिसाइलें ध्वनि की गति से कई गुना तेज़ चलती हैं और किसी भी समय अपनी दिशा बदल सकती हैं, जिससे उन्हें इंटरसेप्ट करना बेहद मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि Russia और China जैसे देश इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ चुके हैं और उन्होंने ऐसे हथियार विकसित कर लिए हैं, जो पारंपरिक रक्षा कवच को आसानी से भेद सकते हैं। इस परिदृश्य में अमेरिका का यह कबूलनामा साफ संकेत देता है कि वह इस नई तकनीकी दौड़ में चुनौती का सामना कर रहा है और उसे अपनी रणनीति में बड़े बदलाव करने होंगे।

इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए अमेरिकी प्रशासन ने “गोल्डन डोम” नामक एक महत्वाकांक्षी मिसाइल डिफेंस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया है, जिसे राष्ट्रपति Donald Trump की प्राथमिक योजनाओं में शामिल किया गया है। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य एक बहुस्तरीय सुरक्षा कवच तैयार करना है, जो जमीन, समुद्र, हवा और अंतरिक्ष—चारों स्तरों पर संभावित खतरों को पहचान सके और उनका जवाब दे सके। इसमें अत्याधुनिक सेंसर, तेज़ प्रतिक्रिया देने वाले इंटरसेप्टर और एकीकृत कमांड सिस्टम शामिल किए जाएंगे, जो किसी भी हमले की स्थिति में तुरंत कार्रवाई कर सकें।

हालांकि, इस परियोजना की लागत भी उतनी ही भारी है। शुरुआती अनुमान के मुताबिक “गोल्डन डोम” पर 175 से 185 बिलियन डॉलर तक खर्च हो सकता है और इसे पूरी तरह लागू होने में कई साल लग सकते हैं। 2028 तक इसकी शुरुआती क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इतनी जटिल प्रणाली को पूरी तरह प्रभावी बनाने में इससे अधिक समय लग सकता है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल अमेरिका एक ऐसे संक्रमण काल में है, जहां खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन उनके समाधान अभी अधूरे हैं।

पेंटागन के इस कबूलनामे का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका व्यापक वैश्विक प्रभाव पड़ना तय है। यह उन देशों के लिए भी एक चेतावनी है, जो अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी सैन्य ढांचे पर निर्भर रहे हैं। साथ ही, इससे दुनिया में हथियारों की नई दौड़ और तेज़ हो सकती है, क्योंकि अब हर देश अपने रक्षा तंत्र को और अधिक उन्नत बनाने की कोशिश करेगा।

रणनीतिक विशेषज्ञ इस घटनाक्रम को केवल एक तकनीकी कमी नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के संकेत के रूप में देख रहे हैं। अब तक अमेरिका को सैन्य रूप से लगभग अजेय माना जाता रहा है, लेकिन इस स्वीकारोक्ति ने उस छवि को गहरा झटका दिया है। यह पहली बार है जब अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान ने खुले तौर पर यह माना है कि कुछ क्षेत्रों में वह अपने प्रतिद्वंद्वियों से पीछे रह गया है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि आने वाला दौर पारंपरिक युद्ध का नहीं, बल्कि तकनीकी युद्ध का होगा, जहां जीत उसी की होगी जिसके पास सबसे तेज़, सबसे सटीक और सबसे उन्नत हथियार होंगे। पेंटागन का यह बयान उसी बदलती दुनिया की एक झलक है, जहां सुरक्षा की परिभाषा हर दिन बदल रही है और महाशक्तियों को भी अपनी सीमाओं का सामना करना पड़ रहा है।

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