अंतरराष्ट्रीय | एजेंसी / ABC NATIONAL NEWS | वाशिंगटन / मॉस्को / तेहरान | 29 अप्रैल 2026
मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बदल रहे हैं और तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के बीच टकराव की खबरों ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। ताजा घटनाक्रम में ईरान ने युद्ध को रोकने और तेल आपूर्ति को सामान्य करने के लिए एक प्रस्ताव रखा था, लेकिन ट्रंप ने इसे सख्ती से ठुकरा दिया। इस फैसले के बाद हालात और ज्यादा तनावपूर्ण हो गए हैं।
ईरान ने दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने और संघर्ष को कम करने का प्रस्ताव दिया था। इस कदम को वैश्विक बाजार के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा था, क्योंकि इसी रास्ते से दुनिया का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल की सप्लाई गुजरती है। अगर यह रास्ता बंद होता है, तो तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है और कई देशों की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ सकता है।
लेकिन ट्रंप ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। खबरों के अनुसार, अमेरिका की ओर से इस प्रस्ताव के साथ कुछ सख्त शर्तें जुड़ी थीं, जिनमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कड़ी निगरानी और नियंत्रण शामिल था। यही शर्तें इस बातचीत में सबसे बड़ी रुकावट बन गईं।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और अहम पहलू सामने आया है—रूस का ईरान के साथ खड़ा होना। रूस के समर्थन से ईरान की स्थिति मजबूत हुई है, जिससे अमेरिका की रणनीति पर भी असर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह ध्रुवीकरण और बढ़ता है, तो मिडिल ईस्ट में बड़ा संघर्ष छिड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
तेल बाजार पर इसका असर पहले से दिखने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तनाव कम नहीं हुआ, तो कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है। इसका सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ेगा, जो तेल आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं। स्थिति बेहद नाजुक बनी हुई है। एक तरफ शांति वार्ता की कोशिशें हैं, तो दूसरी ओर कड़े बयान और रणनीतिक कदम भी जारी हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या आने वाले दिनों में कोई समझौता हो पाएगा या फिर यह टकराव एक बड़े संघर्ष का रूप ले लेगा। दुनिया की नजरें अब इसी पर टिकी हैं।




