राजनीति / बिहार | ABC NATIONAL NEWS | पटना/दिल्ली | 23 अप्रैल 2026
बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नाम लगातार चर्चा के केंद्र में है—निशांत कुमार। दिलचस्प बात यह है कि सत्ता के इतने करीब होने के बावजूद वे न तो सरकार का हिस्सा हैं और न ही जनता दल (यूनाइटेड) की नई टीम में उन्हें कोई औपचारिक जिम्मेदारी दी गई है। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेज हो गया है कि आखिर यह दूरी रणनीति है या अनिश्चितता। पूरा घटनाक्रम किसी संयोग का हिस्सा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक योजना है, जिसे खुद नीतीश कुमार की शैली में तैयार किया गया है। लंबे समय तक परिवारवाद के विरोध की राजनीति करने वाले नीतीश कुमार अपने बेटे को सीधे सत्ता या संगठन में स्थापित कर अपने ही सिद्धांतों के खिलाफ नहीं जाना चाहते। यही कारण है कि निशांत की राजनीति को “धीरे-धीरे, जमीन से” तैयार करने का रास्ता चुना गया है।
हाल ही में जब बिहार में नई सरकार का गठन हुआ, तब यह चर्चा भी सामने आई कि निशांत को बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है। लेकिन उन्होंने खुद ही किसी पद को लेने से दूरी बना ली। उन्होंने साफ संकेत दिया कि वे पहले जनता के बीच जाकर अपनी पहचान बनाना चाहते हैं, उसके बाद ही किसी पद की जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे। यह रुख उन्हें बाकी राजनीतिक परिवारों के वारिसों से अलग करता है, जहां अक्सर सीधे सत्ता में प्रवेश देखने को मिलता है।
इसी कड़ी में जेडीयू की नई राष्ट्रीय और प्रदेश टीम का गठन भी अहम रहा। पार्टी ने अपने पुराने और भरोसेमंद नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपीं, लेकिन निशांत को इस संरचना से बाहर रखा गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह “बाहर रखना” नहीं बल्कि “समय देना” है, ताकि वे संगठन की बारीकियों को समझ सकें और बिना किसी पद के भी अपनी स्वीकार्यता बना सकें।
अब नजरें उनकी प्रस्तावित बिहार यात्रा पर टिकी हैं, जिसे उनकी असली राजनीतिक शुरुआत माना जा रहा है। योजना के मुताबिक वे पश्चिम चंपारण से पूरे राज्य का दौरा करेंगे और 38 जिलों में कार्यकर्ताओं व आम लोगों से संवाद करेंगे। यह यात्रा सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक पहचान गढ़ने का मंच होगी। दिलचस्प बात यह है कि नीतीश कुमार खुद भी अपनी राजनीति में जनसंवाद यात्राओं के जरिए मजबूत हुए थे और अब वही मॉडल उनके बेटे पर लागू किया जा रहा है।
बीते कुछ समय में निशांत ने पार्टी के कई नेताओं, जिलाध्यक्षों और कार्यकर्ताओं से मुलाकातें भी तेज कर दी हैं। यह संकेत देता है कि वे संगठन के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करने की दिशा में सक्रिय हो चुके हैं। साथ ही सोशल मीडिया पर उनकी बढ़ती मौजूदगी भी इस बात का संकेत है कि वे नई पीढ़ी के मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
बिहार की राजनीति पहले से ही दूसरी पीढ़ी के नेताओं के दौर में प्रवेश कर चुकी है। तेजस्वी यादव और चिराग पासवान जैसे चेहरे पहले से सक्रिय हैं। ऐसे में जेडीयू भी अपने भविष्य को लेकर सतर्क है, लेकिन जल्दबाजी से बचते हुए। यही वजह है कि निशांत को फिलहाल कोई पद नहीं दिया गया, बल्कि उन्हें समय और स्पेस दिया जा रहा है।
कुल मिलाकर तस्वीर साफ है—निशांत कुमार की राजनीति अभी “तैयारी के दौर” में है। वे न सरकार में हैं, न संगठन में, लेकिन उनकी भूमिका तय मानी जा रही है। असली सवाल अब यह नहीं कि वे राजनीति में आएंगे या नहीं, बल्कि यह है कि वे कब पूरी ताकत के साथ सामने आएंगे। आने वाले महीनों में उनकी बिहार यात्रा और जमीनी सक्रियता ही यह तय करेगी कि वे अपने पिता की राजनीतिक विरासत को किस तरह संभालते हैं।




