राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 19 अप्रैल 2026
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों लगातार यह दोहरा रहे हैं कि उन्हें किसी भी सरकारी योजना का क्रेडिट नहीं चाहिए, उन्हें बस देश की सेवा करनी है। लेकिन विपक्षी दलों और कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह दावा हकीकत से कोसों दूर है। जहां एक तरफ वे मंचों से क्रेडिट लेने से इनकार करते नजर आते हैं, वहीं सरकारी योजनाओं, कार्यक्रमों और विकास परियोजनाओं पर उनके फोटो वाले होर्डिंग, पोस्टर, राशन बैग, खाद के कट्टे, वैक्सीन सर्टिफिकेट और यहां तक कि टॉयलेट के उद्घाटन पट्टिकाओं पर भी उनकी तस्वीरें छाई हुई हैं। आलोचक इसे ‘क्रेडिट फ्री’ की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास बता रहे हैं।
पिछले दस वर्षों में केंद्र सरकार की लगभग हर प्रमुख योजना को मोदी जी के व्यक्तिगत ब्रांडिंग से जोड़ दिया गया है। 5 किलो राशन वितरण के बैग पर उनकी फोटो छपी हुई है, जिसे लेकर विपक्ष कह रहा है कि गरीबों को मिलने वाली इस सहायता को भी व्यक्तिगत प्रचार का माध्यम बना लिया गया। इसी तरह कोविड-19 वैक्सीनेशन अभियान के सर्टिफिकेट पर प्रधानमंत्री की तस्वीर छपवाकर पूरे देश को यह संदेश दिया गया कि यह उपलब्धि किसी एक व्यक्ति की देन है। आलोचक पूछते हैं कि जब वैक्सीन बनाने, खरीदने और वितरित करने में पूरी सरकारी मशीनरी, वैज्ञानिक समुदाय और स्वास्थ्य कर्मी लगे थे, तो सर्टिफिकेट पर सिर्फ एक नेता की फोटो क्यों?
खेती-किसानी से जुड़ी योजनाओं में भी यही पैटर्न दिखाई देता है। उड़ान भरने वाले किसान सम्मान निधि के 6,000 रुपये सालाना को 500 रुपये मासिक बताकर प्रचारित किया गया और उसके साथ-साथ खाद के 50 किलो के कट्टों को 40 किलो का करके उन पर प्रधानमंत्री की बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपवा दी गईं। किसानों की आय दोगुनी करने का वादा 2014 में किया गया था, लेकिन 2024 तक भी पूरा नहीं हो सका। इसके बावजूद हर सरकारी दस्तावेज, आवेदन फॉर्म और प्रमाण-पत्र पर मोदी जी की मुस्कुराती हुई तस्वीर अनिवार्य रूप से मौजूद है। मनरेगा का नाम बदलकर ‘मनरेगा’ को भी नए सिरे से ब्रांड किया गया और उसकी पट्टिकाओं, साइटों पर प्रधानमंत्री की फोटो लगाई गई, जबकि यह योजना यूपीए सरकार के समय शुरू हुई थी।
आवास योजना हो या स्वास्थ्य, शिक्षा, खेल या बुनियादी ढांचा, हर जगह एक ही कहानी है। इंदिरा आवास योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री आवास योजना कर दिया गया और हर मकान की पट्टिका पर मोदी जी की फोटो अनिवार्य कर दी गई। स्कूलों, कॉलेजों, यूनिवर्सिटियों, स्टेडियमों, अस्पतालों, एयरपोर्ट्स, पेट्रोल पंपों, पीजीआई, एम्स और सरकारी दफ्तरों तक में विशाल होर्डिंग लगे हुए हैं, जिन पर प्रधानमंत्री की तस्वीर के साथ “यह विकास मोदी की गारंटी है” जैसे नारे लिखे हैं। आलोचक याद दिलाते हैं कि कांग्रेस शासनकाल में भी इन योजनाओं का विस्तार हुआ था, लेकिन उस समय किसी भी कांग्रेसी नेता की फोटो इन पर नहीं लगाई जाती थी।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह ‘क्रेडिटलेस’ होने का दावा और वास्तविकता में हर जगह अपनी मौजूदगी सुनिश्चित करने का तरीका, दोनों एक साथ चल रहे हैं। जब भी कोई नया प्रोजेक्ट शुरू होता है या पुरानी योजना का विस्तार होता है, तो उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री की मौजूदगी अनिवार्य हो जाती है। यहां तक कि ग्राम पंचायत स्तर पर बने शौचालयों के उद्घाटन में भी उनकी तस्वीर वाली पट्टिका लगाई जा रही है। विपक्ष का कहना है कि विकास कार्य सामूहिक प्रयास का परिणाम होते हैं, लेकिन वर्तमान शासन में उन्हें एक व्यक्ति की छवि से जोड़ने की कोशिश की जा रही है, जो लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है।
सरकार के समर्थक हालांकि इसे “लोकप्रियता का प्रतीक” बताते हैं और कहते हैं कि जनता प्रधानमंत्री को विकास का चेहरा मानती है, इसलिए उनकी तस्वीर लगाना स्वाभाविक है। लेकिन आलोचकों का तर्क है कि जब स्वयं प्रधानमंत्री मंच से कह रहे हैं कि “मुझे क्रेडिट नहीं चाहिए”, तो फिर हर सरकारी सामग्री, दस्तावेज और पट्टिका पर उनकी फोटो क्यों अनिवार्य है? यह सवाल आज पूरे देश में जोर-शोर से उठ रहा है।
चाहे राशन हो, दवा हो, खाद हो, वैक्सीन हो या आवास, हर जगह एक ही चेहरा। विकास की गाथा को व्यक्तिगत ब्रांड में बदल देने की इस रणनीति पर बहस अब राजनीतिक गलियारों से निकलकर आम जनता तक पहुंच चुकी है। क्या यह सच्ची नम्रता है या फिर चतुर प्रचार? समय के साथ यह सवाल और तेज होता जा रहा है।




