राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अप्रैल 2026
संसद के विशेष सत्र में एक बार फिर नारी शक्ति वंदन अधिनियम की चर्चा छा गई है और इस बार मुद्दा सिर्फ महिलाओं के सशक्तिकरण का नहीं बल्कि सख्त राजनीतिक गणित का भी बन गया है। यह संविधान संशोधन वाला विधेयक है जिसके लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों जगह दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ेगी यानी लोकसभा की 543 सीटों पर कम से कम 360 वोट और राज्यसभा के 245 सदस्यों में से 163 वोट चाहिए। एनडीए के पास लोकसभा में अभी करीब 293 सांसद हैं जो सामान्य बहुमत के लिए काफी हैं लेकिन दो-तिहाई की राह में यह संख्या काफी कम पड़ जाती है। ऐसे में सरकार को कम से कम 60-70 अतिरिक्त समर्थन की तलाश है जो या तो विपक्ष के कुछ हिस्से से आएगा या फिर उन क्षेत्रीय दलों से जो अभी गठबंधन से बाहर हैं लेकिन मुद्दे के आधार पर साथ खड़े हो चुके हैं। विपक्षी दलों के पास भी 240 से ज्यादा सांसद हैं और अगर वे पूरी तरह एकजुट हो गए तो किसी भी संशोधन को रोकने की ताकत रखते हैं। यही वजह है कि महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी अब नंबर गेम और आपसी अविश्वास हावी नजर आ रहा है।
सरकार की तरफ से यह विधेयक महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने का बड़ा कदम बताया जा रहा है लेकिन इसमें एक अहम शर्त भी जोड़ी गई है कि इसे तुरंत लागू नहीं किया जाएगा बल्कि पहले नई जनगणना होगी फिर सीटों का परिसीमन होगा और उसके बाद ही आरक्षण अमल में आएगा। यानी 2029 या उसके बाद ही इसका असली असर दिख सकता है। सरकार का कहना है कि यह प्रक्रिया इसलिए जरूरी है ताकि आरक्षण सही तरीके से लागू हो और भविष्य में कोई कानूनी उलझन न आए लेकिन विपक्ष इसे साफ तौर पर टालने की रणनीति बता रहा है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल कह रहे हैं कि महिला आरक्षण का मुद्दा पुराना है और वे खुद इसके समर्थन में हैं लेकिन सरकार की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि परिसीमन की आड़ में असल मकसद उत्तर भारत में सीटें बढ़ाकर अपनी ताकत मजबूत करना है जबकि दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है। विपक्ष OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा यानी कोटा के अंदर कोटा की भी मांग कर रहा है ताकि सामाजिक न्याय का संतुलन बना रहे वरना यह आरक्षण सिर्फ कुछ खास वर्गों तक सीमित होकर रह जाएगा।
दोनों सदनों में स्थिति लगभग एक जैसी है। राज्यसभा में एनडीए के पास करीब 134 सदस्य हैं जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए 163 वोट चाहिए। यहां भी सरकार को क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय सदस्यों का सहारा लेना पड़ेगा। संसद के गलियारों में चर्चा है कि अगर विपक्ष ने एकजुटता दिखाई तो यह विधेयक फिर अटक सकता है। याद रहे 1996 से 2010 तक यह बिल कई बार आया लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से फंस गया। 2010 में राज्यसभा से पास होने के बावजूद लोकसभा में यह अटक गया था। अब 2026 के इस विशेष सत्र में सरकार इसे ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है और कह रही है कि विपक्ष की पुरानी मांग को पूरा करने जा रही है लेकिन विपक्ष का रुख साफ है कि बिना OBC सब-कोटा और बिना परिसीमन की शर्त हटाए समर्थन नहीं मिलेगा। परिसीमन का मुद्दा सिर्फ लैंगिक समानता का नहीं बल्कि क्षेत्रीय संतुलन का भी बन गया है क्योंकि 1971 की जनगणना के आधार पर सीटें तय होने के बाद 2026 के बाद नए परिसीमन से उत्तर के राज्यों को फायदा और दक्षिण को नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है।
कुल मिलाकर यह विधेयक अब सिर्फ नारी शक्ति का प्रतीक नहीं रह गया है बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति नीयत और संख्यात्मक समर्थन की परीक्षा बन गया है। सरकार के लिए यह प्रतिष्ठा का सवाल है तो विपक्ष के लिए भरोसे और पारदर्शिता का। अगर दोनों तरफ से सहमति बनी तो महिलाओं के लिए यह ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है लेकिन फिलहाल नंबर गेम और पुरानी शंकाओं ने पूरे माहौल को जटिल बना दिया है। संसद का यह विशेष सत्र सिर्फ बहस का नहीं बल्कि भविष्य के राजनीतिक समीकरणों का भी आईना बनने वाला है जहां अंतिम फैसला सदन के अंदर ही होगा।




