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महंगाई बनाम मेहनताना: ‘फास्टेस्ट इकोनॉमी’ के दावों के बीच मजदूरों का उबाल, नोएडा से मुंबई तक असंतोष

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/नोएडा | 15 अप्रैल 2026

देश में एक तरफ तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दावे किए जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ ज़मीन पर काम करने वाले लाखों कर्मचारियों और मजदूरों की हालत इन दावों से बिल्कुल उलट तस्वीर पेश कर रही है। नोएडा से सामने आए ताज़ा वीडियो और रिपोर्ट्स ने इस विरोधाभास को और उजागर कर दिया है, जहां कई कर्मचारी 10-12 साल से महज़ 8 से 10 हज़ार रुपये महीने की तनख्वाह पर 12-12 घंटे काम करने को मजबूर हैं। दिल्ली-एनसीआर के औद्योगिक इलाकों—नोएडा, गुड़गांव और फरीदाबाद—से लेकर मुंबई जैसे महानगरों तक, मजदूरों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि जिस सैलरी पर वे आज काम कर रहे हैं, वही उन्हें एक दशक पहले भी मिलती थी। इस बीच महंगाई कई गुना बढ़ चुकी है—किराया, राशन, बच्चों की फीस, इलाज, हर चीज़ आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है।

कुछ समय पहले लखनऊ में मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में काम करने वाली महिलाओं की तस्वीरें भी सामने आई थीं, जहां वे 7,000 रुपये की नौकरी में गुजारा न हो पाने की बात कहती हुई रोती दिखाई दी थीं। अब नोएडा के हालात ने उसी पीड़ा को और गहरा कर दिया है।

मजदूरों का आरोप है कि उन्हें 12 घंटे तक काम कराया जा रहा है, लेकिन मेहनताना इतना कम है कि परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। कई कर्मचारियों ने बताया कि साल भर में उनकी तनख्वाह में सिर्फ 30 से 40 रुपये तक की बढ़ोतरी होती है, जो बढ़ती महंगाई के सामने नगण्य है।

आक्रोश का एक बड़ा कारण हाल ही में लागू किए गए नए लेबर कोड भी बताए जा रहे हैं। मजदूर संगठनों का आरोप है कि इन कानूनों के बाद काम के घंटे बढ़ाकर 12 तक कर दिए गए हैं, जिससे शोषण और बढ़ गया है। उनका कहना है कि इन कानूनों पर व्यापक चर्चा और सहमति के बिना इन्हें लागू किया गया।

इन सबके बीच मजदूरों का सवाल है कि अगर देश वाकई दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, तो उस विकास का लाभ आखिर किसे मिल रहा है? उनका आरोप है कि जहां बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति तेजी से बढ़ रही है, वहीं मेहनतकश वर्ग की आय ठहरी हुई है।

प्रदर्शन कर रहे कर्मचारियों का कहना है कि वे किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत नहीं, बल्कि अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की मजबूरियों के चलते सड़कों पर उतरे हैं। उनका साफ़ कहना है—“भाषणों से पेट नहीं भरता, हमें हमारा हक़ चाहिए।”

हालांकि सत्ता पक्ष की ओर से इन आंदोलनों को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ बयानों में इसे बाहरी ताकतों से जोड़ने की कोशिश भी की गई है, लेकिन मजदूर इसे सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि मेहनताना मांगना कोई साज़िश नहीं, बल्कि उनका अधिकार है।

फिलहाल, देश के अलग-अलग हिस्सों में उठ रही यह आवाज़ एक बड़े सामाजिक-आर्थिक सवाल की ओर इशारा कर रही है—क्या विकास का मॉडल आम आदमी को साथ लेकर चल रहा है या फिर वह सिर्फ आंकड़ों और दावों तक सीमित है?

इतना जरूर है कि मजदूर वर्ग अब खामोश नहीं रहना चाहता। हालात चाहे जैसे भी हों, लेकिन एक बात साफ दिख रही है—देश का मेहनतकश अब अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाने लगा है, और यह आवाज़ अब दबने वाली नहीं लगती।

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