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नेपाल में प्रेस पर ‘आर्थिक प्रहार’! सरकारी विज्ञापन बंदी से मीडिया की आवाज़ पर लगाम, गला घोंटने की तैयारी?

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अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 14 अप्रैल 2026

नेपाल में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर एक गहरा साया मंडराता दिख रहा है। सरकार द्वारा मीडिया संस्थानों को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापनों पर रोक लगाने के फैसले ने पूरे पत्रकारिता जगत में भूचाल ला दिया है। यह महज एक प्रशासनिक कदम नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सीधे-सीधे प्रेस की आर्थिक नस दबाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। सवाल साफ है—क्या नेपाल में अब आवाज़ दबाने के लिए बंदूक नहीं, बजट का इस्तेमाल होगा? सरकारी विज्ञापन किसी भी मीडिया संस्थान के लिए ऑक्सीजन की तरह होते हैं, खासकर छोटे और क्षेत्रीय अखबारों तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए। जब यह स्रोत अचानक बंद कर दिया जाए, तो उसका असर सीधे अस्तित्व पर पड़ता है। ऐसे में यह फैसला उन संस्थानों के लिए ‘आर्थिक मौत का फरमान’ साबित हो सकता है, जो पहले से सीमित संसाधनों में सच्चाई की लड़ाई लड़ रहे हैं। पत्रकार संगठनों का आरोप है कि यह निर्णय प्रेस की रीढ़ तोड़ने और सरकार विरोधी आवाज़ों को खामोश करने का सुनियोजित प्रयास है।

नेपाल के मीडिया गलियारों में बेचैनी खुलकर सामने आ रही है। संपादकों से लेकर ग्राउंड रिपोर्टरों तक, हर कोई इस फैसले को लेकर असुरक्षा और आक्रोश महसूस कर रहा है। कई प्रमुख मीडिया संस्थानों ने इसे ‘आर्थिक सेंसरशिप’ करार देते हुए कहा है कि यह लोकतंत्र पर सीधा हमला है। उनका कहना है कि जब सरकार आलोचना सहन नहीं कर पाती, तो वह कानून का सहारा लेने के बजाय आर्थिक दबाव बनाकर मीडिया को झुकाने की कोशिश करती है—और यही सबसे खतरनाक तरीका होता है।

विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को हथियार बना लिया है और सरकार पर जमकर हमला बोला है। उनका आरोप है कि यह कदम लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या है और इससे साफ जाहिर होता है कि सत्ता अब सवालों से डरने लगी है। कई विपक्षी नेताओं ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने यह फैसला वापस नहीं लिया, तो देशभर में बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू किए जाएंगे।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटनाक्रम ने चिंता बढ़ा दी है। प्रेस स्वतंत्रता की निगरानी करने वाले संगठनों ने नेपाल सरकार को आगाह किया है कि मीडिया पर आर्थिक दबाव बनाना, लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे को कमजोर करता है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि सूचना का अधिकार किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार है, और इस तरह के फैसले सीधे जनता को अंधेरे में धकेलने का काम करते हैं।

जनता के बीच भी इस फैसले को लेकर गहरी चिंता है। एक बड़ा वर्ग इसे खतरनाक संकेत मान रहा है। उनका कहना है कि जब मीडिया कमजोर होता है, तो सबसे पहले आम आदमी की आवाज़ दबती है। क्योंकि मीडिया ही वह माध्यम है, जो सत्ता और जनता के बीच पुल का काम करता है—और अगर यही पुल कमजोर कर दिया जाए, तो लोकतंत्र केवल एक खोखला शब्द बनकर रह जाएगा। निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। क्या बढ़ते दबाव और विरोध के बीच सरकार पीछे हटेगी, या फिर यह टकराव और गहराएगा? फिलहाल इतना तय है कि इस फैसले ने नेपाल में लोकतंत्र, पारदर्शिता और प्रेस की स्वतंत्रता पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—जिसका जवाब अब सरकार को देना ही होगा।

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