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वोट का हक कागज़ नहीं, सम्मान है: SIR पर सुप्रीम कोर्ट की EC को फटकार

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 अप्रैल 2026

चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और मतदाता अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संदिग्ध SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को लेकर सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि किसी भी नागरिक का वोट देने का अधिकार केवल कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि उसकी पहचान और सम्मान से जुड़ा हुआ है। कोर्ट की इस टिप्पणी ने पूरे मामले को संवैधानिक बहस से आगे बढ़ाकर लोकतांत्रिक मूल्यों के केंद्र में ला खड़ा किया है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पश्चिम बंगाल में लागू की गई ‘Logical Discrepancy’ श्रेणी पर विशेष आपत्ति जताई। कोर्ट ने पूछा कि जब ऐसी व्यवस्था देश के अन्य राज्यों में नहीं है, तो केवल एक राज्य में इसे लागू करना किस आधार पर उचित ठहराया जा सकता है। अदालत ने इसे स्पष्ट असंगति बताते हुए संकेत दिया कि चुनावी प्रक्रिया में एकरूपता और पारदर्शिता अनिवार्य है, वरना इससे मतदाताओं का भरोसा कमजोर होता है।

चुनाव आयोग के रुख में अंतर को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि बिहार में 2002 की मतदाता सूची में शामिल लोगों को अतिरिक्त दस्तावेज़ से छूट दी गई थी, लेकिन पश्चिम बंगाल में उसी सिद्धांत से पीछे हटना गंभीर सवाल खड़े करता है। कोर्ट के मुताबिक, ऐसी नीति न केवल भ्रम पैदा करती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि नियमों का अनुपालन एक समान तरीके से नहीं हो रहा।

सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी परिणामों की विश्वसनीयता पर भी चिंता जताई। अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर जीत का अंतर बहुत कम हो और बड़ी संख्या में मतदाता मतदान से वंचित रह जाएं, तो नतीजों की निष्पक्षता पर सवाल उठना तय है। यह टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि चुनाव केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि हर मतदाता की भागीदारी सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी है।

इसके साथ ही अदालत ने एक मजबूत अपीलीय तंत्र की आवश्यकता पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब अधिकारी बड़ी संख्या में दस्तावेजों की जांच करते हैं, तो त्रुटि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में अगर किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से सूची से बाहर हो जाए, तो उसके पास न्याय पाने का प्रभावी रास्ता होना चाहिए। चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट संदेश है कि लोकतंत्र में हर वोट की कीमत बराबर है और किसी भी नागरिक को उसके अधिकार से वंचित करने वाली प्रक्रिया स्वीकार्य नहीं हो सकती। अब देखना होगा कि चुनाव आयोग इस पर क्या कदम उठाता है, लेकिन फिलहाल अदालत की सख्त टिप्पणी ने पूरे देश का ध्यान इस मुद्दे की ओर खींच लिया है।

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