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कंगना के बहाने बीजेपी गिरी नीचे स्तर पर: “टपोरी” की भाषा और “महिलाओं की असहजता” का राजनीतिक इस्तेमाल—क्यों खतरनाक है यह बयान?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 18 मार्च 2026

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी बहस की संस्कृति रही है—जहाँ विचारों का टकराव होता है, व्यक्तियों का नहीं। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह की भाषा सार्वजनिक जीवन में इस्तेमाल हो रही है, वह इस परंपरा को कमजोर कर रही है। बीजेपी सांसद कंगना रनौत द्वारा राहुल गांधी को लेकर दिया गया बयान—“टपोरी की तरह आते हैं” और “उन्हें देखकर महिलाएं असहज होती हैं”—सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर सीधा आघात है।

यह केवल एक व्यक्ति का बयान नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का प्रतिबिंब है जिसमें अब शब्दों की मर्यादा तेजी से टूट रही है। जब सत्ताधारी दल के सांसद इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह गिरता स्तर व्यक्तिगत है या फिर राजनीतिक संरक्षण में पनप रही प्रवृत्ति?

सबसे गंभीर बात यह है कि इस बयान में दो स्तरों पर गिरावट साफ दिखाई देती है। पहला, एक निर्वाचित सांसद द्वारा किसी विपक्षी नेता के लिए सड़कछाप शब्दों का इस्तेमाल। संसद, जो देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है, वहाँ आने वाले किसी भी प्रतिनिधि के लिए “टपोरी” जैसे शब्दों का प्रयोग न केवल असम्मानजनक है बल्कि यह राजनीतिक विमर्श को भी नीचे गिराता है। अगर संसद के सदस्य ही इस तरह की भाषा अपनाएँगे, तो आम आदमी के बीच संवाद की मर्यादा कैसे बची रहेगी?

दूसरा और उससे भी अधिक चिंताजनक पहलू है—महिलाओं के नाम का इस्तेमाल। “महिलाएं असहज हो जाती हैं” कहना एक व्यापक और गंभीर आरोप है, लेकिन इसके पीछे कोई ठोस प्रमाण या संदर्भ नहीं दिया गया। इस तरह महिलाओं की भावनाओं को एक राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करना, असल में उनके वास्तविक मुद्दों—सुरक्षा, शिक्षा, समान अवसर—से ध्यान भटकाने जैसा है। यह महिलाओं के सम्मान की रक्षा नहीं, बल्कि उनकी भावनाओं का राजनीतिक दोहन है।

राजनीति में असहमति लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन जब आलोचना व्यक्तिगत अपमान, तंज और छवि धूमिल करने तक सिमट जाती है, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता गिरने लगती है। आज ज़रूरत है कि बहस मुद्दों पर हो—रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई—न कि किसी की चाल-ढाल या व्यक्तित्व पर।

कंगना रनौत अपने बेबाक अंदाज़ के लिए जानी जाती हैं, लेकिन सार्वजनिक जीवन में “बेबाकी” की भी एक सीमा होती है। एक सांसद के रूप में उनके शब्द सिर्फ उनके निजी विचार नहीं होते, बल्कि वे एक राजनीतिक संदेश बन जाते हैं। ऐसे में जिम्मेदारी और संयम अनिवार्य हो जाता है।

यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक दल, खासकर सत्ताधारी दल, अपने नेताओं की भाषा पर स्पष्ट रुख अपनाएँ। चुप्पी कई बार सहमति के रूप में देखी जाती है। यदि इस तरह के बयानों पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं आती, तो यह संदेश जाता है कि इस स्तर की भाषा अब स्वीकार्य है।

आखिरकार, यह विवाद सिर्फ कंगना रनौत या राहुल गांधी तक सीमित नहीं है। यह उस दिशा का संकेत है, जिसमें भारतीय राजनीति आगे बढ़ रही है। अगर अब भी संवाद की गरिमा को नहीं बचाया गया, तो आने वाले समय में राजनीतिक बहस पूरी तरह व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाएगी—और तब नुकसान किसी एक दल का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।

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