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सेक्युलरिज़्म हटाने की बात… लेकिन बीजेपी के अपने संविधान में दर्ज है धर्मनिरपेक्षता! आखिर बदला क्या?

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 28 जून 2026

देश में इन दिनों संविधान से “सेक्युलर” शब्द हटाने की मांग को लेकर राजनीतिक बहस तेज है। कई बीजेपी नेता सार्वजनिक मंचों से धर्मनिरपेक्षता की आलोचना करते हुए इसे संविधान से हटाने की वकालत कर रहे हैं। टीवी बहसों में भी कुछ प्रवक्ता सेक्युलरिज़्म को “तुष्टीकरण” की राजनीति से जोड़कर प्रस्तुत करते हैं। लेकिन इस पूरे विवाद के बीच एक ऐसा तथ्य सामने आता है जो इस बहस को एक नया आयाम देता है—भारतीय जनता पार्टी के अपने संविधान में ही “सेक्युलरिज़्म” और “सर्व धर्म समभाव” के प्रति प्रतिबद्धता दर्ज है।

बीजेपी के संविधान के अनुच्छेद-2 (Objectives) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पार्टी भारत के संविधान के प्रति पूर्ण निष्ठा रखेगी तथा “Socialism, Secularism and Democracy” के सिद्धांतों का पालन करेगी। वहीं अनुच्छेद-4 (Commitments) में पार्टी स्वयं को “Positive Secularism (Sarva Dharma Samabhav)”, गांधीवादी दृष्टिकोण और मूल्य-आधारित राजनीति के प्रति प्रतिबद्ध बताती है। यानी जिस शब्द का आज सार्वजनिक मंचों पर विरोध किया जा रहा है, वही शब्द पार्टी के आधिकारिक संविधान का हिस्सा भी है।

यही वह बिंदु है जिस पर आज सबसे गंभीर सवाल खड़े होते हैं। यदि धर्मनिरपेक्षता अब गलत विचार है, तो क्या पार्टी अपने संविधान में दर्ज उस प्रतिबद्धता से भी असहमत हो चुकी है? और यदि पार्टी अब भी अपने संविधान को सही मानती है, तो फिर सार्वजनिक मंचों पर सेक्युलरिज़्म के विरुद्ध दिए जा रहे बयान किस वैचारिक आधार पर दिए जा रहे हैं? लोकतांत्रिक राजनीति में विचार बदल सकते हैं, लेकिन तब स्वाभाविक अपेक्षा यह होती है कि राजनीतिक दल अपने आधिकारिक दस्तावेज़ों में भी उसी परिवर्तन को स्पष्ट रूप से दर्ज करें।

भारत का संविधान किसी एक धर्म के पक्ष या विपक्ष में खड़ा नहीं होता। भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ राज्य द्वारा सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार और प्रत्येक नागरिक को समान संवैधानिक अधिकार देना है। यही सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना का हिस्सा है। इसी कारण “सर्व धर्म समभाव” और “धर्मनिरपेक्षता” को लंबे समय तक परस्पर पूरक अवधारणाओं के रूप में देखा जाता रहा है।

बीजेपी के संविधान में “Positive Secularism” का उल्लेख भी इसी विचार की ओर संकेत करता है कि राज्य सभी आस्थाओं का सम्मान करेगा और किसी एक धर्म के पक्ष में खड़ा नहीं होगा। यदि पार्टी आज भी इस दस्तावेज़ को अपना आधिकारिक संविधान मानती है, तो यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि उसके वर्तमान राजनीतिक वक्तव्यों और संविधान में लिखे सिद्धांतों के बीच सामंजस्य कैसे स्थापित किया जाए।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों को अपने विचार रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण बात यह भी है कि उनके सार्वजनिक वक्तव्य, वैचारिक दावे और आधिकारिक दस्तावेज़ एक-दूसरे के अनुरूप हों। यदि किसी सिद्धांत का विरोध किया जा रहा है, जबकि वही सिद्धांत पार्टी के अपने संविधान में दर्ज है, तो स्वाभाविक रूप से जनता के मन में प्रश्न उठेंगे।

आख़िरकार, यह बहस केवल “सेक्युलर” शब्द की नहीं है, बल्कि राजनीतिक वैचारिक निरंतरता और सार्वजनिक जवाबदेही की भी है। यदि कोई दल अपने आधिकारिक संविधान में धर्मनिरपेक्षता के प्रति निष्ठा व्यक्त करता है, तो उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि वर्तमान राजनीतिक विमर्श में वह उस प्रतिबद्धता को किस रूप में देखता है। लोकतंत्र में सबसे मजबूत तर्क वही होता है, जो अपने ही दस्तावेज़ों और घोषित सिद्धांतों के साथ भी संगत हो।

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