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ABC NATIONAL NEWS पूछता है सवाल: क्या ‘चाय-बिस्कुट’ पर मर्यादा बच रही है, या असली मुद्दों से ध्यान भटक रहा है?

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ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 मार्च 2026

संसद की सीढ़ियों पर चाय-बिस्कुट की एक तस्वीर ने ऐसा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है, मानो लोकतंत्र की सारी मर्यादाएं उसी पल दांव पर लग गई हों। 12 मार्च को Rahul Gandhi और कुछ विपक्षी सांसद LPG संकट के विरोध में मकर द्वार पर बैठे। तस्वीर सामने आई—चाय का कप, बिस्कुट, और विरोध का प्रतीक। इसके बाद चिट्ठियां, बयान और “संवैधानिक मर्यादा” की दुहाई देने वालों की कतार लग गई।

लेकिन ABC NATIONAL NEWS पूछता है—क्या यह सच में मर्यादा की चिंता है, या फिर चयनात्मक आक्रोश (Selective Outrage) का नया अध्याय?

जब राफेल सौदे की कीमतों पर देश ने जवाब मांगा—चुप्पी साध ली गई… लेकिन किसी ने चिट्ठी नहीं लिखी।
जब पीएम केयर्स फंड के हिसाब-किताब पर सवाल उठे—जवाबदेही गायब रही… लेकिन किसी ने चिट्ठी नहीं लिखी।
जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एप्सटीन फाइल जैसे मामलों में नाम सामने आए—खामोशी और गहरी हो गई… लेकिन किसी ने चिट्ठी नहीं लिखी।

चंडीगढ़ मेयर चुनाव में जो कुछ हुआ, उसे पूरे देश ने देखा। लोकतंत्र की प्रक्रिया पर सवाल उठे, लेकिन तब भी कोई संगठित आक्रोश नहीं दिखा… किसी ने चिट्ठी नहीं लिखी। संसद में भाषा का स्तर गिरा, जब गृह मंत्री द्वारा आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल हुआ—तब भी मर्यादा की रक्षा के नाम पर कोई अभियान नहीं चला… किसी ने चिट्ठी नहीं लिखी।

लेकिन जैसे ही राहुल गांधी संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय पीते नजर आते हैं, अचानक कुछ पूर्व अधिकारियों को संविधान याद आ जाता है, परंपराएं जाग उठती हैं और चिट्ठियां धड़ाधड़ लिखी जाने लगती हैं।

ABC NATIONAL NEWS पूछता है—क्या यह संयोग है, या फिर एक तयशुदा नैरेटिव?

क्या चाय-बिस्कुट से ज्यादा बड़ा मुद्दा LPG संकट नहीं है, जिससे आम आदमी का चूल्हा प्रभावित हो रहा है? क्या विरोध का तरीका ज्यादा अहम है, या विरोध का कारण? अगर संसद की मर्यादा की इतनी चिंता है, तो फिर उन मुद्दों पर समान संवेदनशीलता क्यों नहीं दिखाई जाती, जहां जनता सीधे प्रभावित होती है?

यह बहस अब सिर्फ एक तस्वीर की नहीं रही। यह उस सोच की बहस है, जिसमें असली मुद्दों से ध्यान हटाकर प्रतीकों को केंद्र में ला दिया जाता है। विपक्ष को “थिएट्रिक्स” कह देना आसान है, लेकिन जनता के सवालों का जवाब देना मुश्किल है।

और अब एक बड़ा सवाल—देश की जनता क्या समझ नहीं रही? क्या उसे यह दिखाई नहीं दे रहा कि किन मुद्दों पर आवाज उठाई जा रही है और किन पर चुप्पी साधी जा रही है?

कुछ लोग इसे स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया बताएंगे, लेकिन यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ये चिट्ठियां किसी इशारे पर लिखी जा रही हैं? या फिर यह उस राजनीतिक बेचैनी का संकेत है, जहां एक विपक्षी नेता की मौजूदगी ही सत्ता को असहज कर रही है?

ABC NATIONAL NEWS का सीधा सवाल है—
क्या हम ‘चाय-बिस्कुट’ पर बहस करेंगे, या देश के असली मुद्दों पर जवाब मांगेंगे?

लोकतंत्र में असली ताकत जनता के पास होती है। और जनता अब यह तय कर रही है कि उसे प्रतीकों की राजनीति चाहिए या अपने सवालों पर साफ, सीधा और ईमानदार जवाब।

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