राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 17 मार्च 2026
राज्यसभा चुनाव 2026 ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राजनीति में वफादारी के दावे जितने मजबूत दिखते हैं, हकीकत में उतने ही खोखले साबित हो रहे हैं। बिहार, ओडिशा और हरियाणा में सामने आए घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर गहरे संकट को उजागर कर दिया है, जहां पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर की गई वोटिंग ने पूरे चुनावी गणित को उलट दिया।
बिहार में Faisal Rahman का पूरे दिन गायब रहना और मतदान से दूरी बनाना विपक्ष के लिए भारी पड़ा। वहीं ओडिशा में Sofia Firdous ने पार्टी लाइन से हटकर वोटिंग करते हुए भाजपा समर्थित उम्मीदवार को फायदा पहुंचाया। इन दोनों घटनाओं ने विपक्षी एकजुटता को सीधा झटका दिया और NDA के पक्ष में समीकरण झुका दिए।
अब हरियाणा में भी तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी है। कांग्रेस के दो मुस्लिम विधायक—Mohammad Izrail और Chaudhary Ilyas—ने भी पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर वोटिंग की, जिससे कांग्रेस को अपनी ही जमीन पर नुकसान उठाना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चार मुस्लिम विधायकों की भूमिका ने विपक्षी रणनीति को कमजोर किया और भाजपा को सीधा लाभ पहुंचाया।
सबसे बड़ा सवाल अब यही उठ रहा है कि जिस पार्टी को लेकर अक्सर “मुस्लिम प्रतिनिधित्व” की राजनीति की जाती है, उसी के विधायक निर्णायक वक्त पर विपरीत दिशा में क्यों खड़े नजर आए? क्या यह व्यक्तिगत समीकरणों का खेल था या फिर सत्ता के दबाव और प्रलोभन की राजनीति? यह बहस अब खुलकर जनता के बीच पहुंच चुकी है।
इन घटनाओं ने मुस्लिम नेतृत्व की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मतदाता यह पूछ रहे हैं कि जिन प्रतिनिधियों को भरोसे के साथ चुना गया, क्या वे उसी भरोसे पर खरे उतर रहे हैं या फिर राजनीतिक फायदे के लिए जनादेश से समझौता किया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की क्रॉस वोटिंग लोकतंत्र की बुनियाद को कमजोर करती है। यह सिर्फ एक चुनाव का मामला नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास का संकट है, जिस पर लोकतंत्र टिका हुआ है।
राज्यसभा चुनाव 2026 ने साफ संकेत दे दिया है—अब राजनीति सिर्फ वोट बैंक की नहीं, बल्कि जवाबदेही की परीक्षा बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस इस संकट से कैसे निपटती है और क्या इन घटनाओं पर कोई ठोस कार्रवाई होती है, या फिर यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा।




