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ओपिनियन | राजनीति का दो मुंहा सांप है केजरीवाल

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 27 फरवरी 2026

भारतीय राजनीति में गठबंधन और टकराव की दिशा तेजी से बदलती रहती है, लेकिन आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक सफर इन उतार-चढ़ावों की सबसे स्पष्ट मिसाल बनता जा रहा है। 27 फरवरी 2026 को दिल्ली की एक अदालत ने दिल्ली एक्साइज पॉलिसी मामले में केजरीवाल, पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि नीति निर्माण में किसी व्यापक आपराधिक साजिश या दुर्भावनापूर्ण इरादे के पर्याप्त संकेत नहीं मिले। यह फैसला केजरीवाल के लिए बड़ी कानूनी और राजनीतिक राहत के रूप में सामने आया, क्योंकि 2024 में गिरफ्तारी के बाद उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा था।

फैसले के तुरंत बाद सियासी माहौल गरमा गया। केजरीवाल ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर राजनीतिक साजिश का आरोप लगाया और दिल्ली में चुनावी चुनौती देते हुए कहा कि अगर बीजेपी 10 से अधिक सीटें जीत लेती है तो वे राजनीति छोड़ देंगे। दूसरी ओर कांग्रेस ने फैसले को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी और बीजेपी पर आरोप लगाया कि चुनावी गणित को साधने के लिए AAP को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाया जा रहा है ताकि कांग्रेस कमजोर हो। कांग्रेस नेताओं ने बीजेपी की रणनीति को “इच्छाधारी नाग” की राजनीति बताते हुए इसे विपक्षी समीकरण को प्रभावित करने की कोशिश बताया।

लेकिन असली राजनीतिक बहस तब शुरू हुई जब केजरीवाल ने सार्वजनिक मंच से यह सवाल उठाया कि राहुल गांधी, सोनिया गांधी और रॉबर्ट वाड्रा जेल क्यों नहीं गए जबकि वे, सिसोदिया और संजय सिंह जेल गए। यह बयान स्वाभाविक रूप से राजनीतिक विवाद का कारण बना, क्योंकि यही गांधी परिवार उनके कठिन दौर में खुलकर समर्थन देता दिखा था। गिरफ्तारी के समय कांग्रेस नेतृत्व ने न केवल राजनीतिक समर्थन दिया बल्कि सार्वजनिक मंचों पर उनके परिवार के साथ खड़े होकर विपक्षी एकजुटता का संदेश भी दिया था। ऐसे में अब वही कांग्रेस और गांधी परिवार सवालों के निशाने पर हैं तो राजनीतिक हलकों में इसे कृतघ्नता और अवसरवाद के नजरिए से भी देखा जा रहा है।

पृष्ठभूमि: समर्थन, संघर्ष और अविश्वास की कहानी

2024 में गिरफ्तारी के दौरान कांग्रेस ने केजरीवाल के समर्थन में खुलकर आवाज उठाई थी। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने गिरफ्तारी का विरोध किया, जबकि सोनिया गांधी ने रामलीला मैदान की रैली में सुनीता केजरीवाल के साथ मंच साझा कर विपक्षी एकजुटता का संदेश दिया था। उस समय लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और AAP के बीच तालमेल की संभावनाएं भी बनी थीं।

इसके बावजूद AAP की राजनीति की नींव अन्ना आंदोलन से निकली उस व्यवस्था विरोधी सोच पर टिकी रही जो पारंपरिक दलों, खासकर कांग्रेस, के खिलाफ बनी थी। यही कारण है कि समर्थन के बावजूद दोनों दलों के बीच विश्वास कभी स्थायी नहीं हो पाया। 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत और AAP की सत्ता समाप्त होने के बाद केजरीवाल का मुख्य निशाना बीजेपी रही, लेकिन अब कांग्रेस भी उनके सीधे राजनीतिक हमलों का केंद्र बनती दिख रही है।

इतना ही नहीं, हिमाचल, हरियाणा, गोवा, गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों में AAP द्वारा उम्मीदवार उतारने को कांग्रेस के भीतर वोट कटाव की रणनीति के रूप में देखा गया। राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि कई राज्यों में विपक्षी वोटों के विभाजन से बीजेपी को अप्रत्यक्ष लाभ मिला, जिससे कांग्रेस और AAP के बीच अविश्वास और गहरा हुआ।

क्लीन चिट के बाद बढ़ा सियासी तनाव

अदालती राहत के बाद कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने बीजेपी पर हमला करते हुए इसे राजनीतिक पटकथा बताया और आरोप लगाया कि चुनावी माहौल में कुछ दलों को राहत और कुछ को दबाव में रखने की रणनीति अपनाई जा रही है। कांग्रेस ने “वेंडेटा गवर्नेंस” का आरोप लगाते हुए AAP की राजनीतिक भूमिका पर भी सवाल खड़े किए।

इसके जवाब में केजरीवाल ने कांग्रेस नेतृत्व पर तीखा हमला करते हुए पूछा कि जब AAP नेताओं को जेल भेजा गया तो कांग्रेस के बड़े नेताओं के खिलाफ वैसी कार्रवाई क्यों नहीं हुई। उन्होंने कांग्रेस को बीजेपी के साथ परोक्ष समझ का आरोप लगाते हुए खासकर गुजरात जैसे राज्यों में कांग्रेस को कमजोर कड़ी बताया। गुजरात में उनके कार्यक्रम और संगठन विस्तार की कोशिशें यह संकेत देती हैं कि AAP बीजेपी के साथ-साथ कांग्रेस के राजनीतिक आधार को भी चुनौती देने की रणनीति पर काम कर रही है।

बीजेपी की ओर से यह कहा गया कि अदालत का फैसला अंतिम नहीं है और जांच एजेंसियां आगे कानूनी विकल्पों पर विचार करेंगी, जिससे यह स्पष्ट है कि कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर संघर्ष जारी रहेगा।

जनमत और राजनीतिक संकेत

राजनीतिक हलकों और सोशल मीडिया में चल रही बहस यह दिखाती है कि AAP और कांग्रेस के बीच प्रतिस्पर्धा अब खुलकर सामने आ रही है। पंजाब, गुजरात और शहरी सीटों वाले राज्यों में दोनों दलों के समर्थकों के बीच बयानबाजी तेज हुई है। यह प्रतिस्पर्धा केवल राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं बल्कि समान वोट बैंक पर दावेदारी से भी जुड़ी है।

यहीं भरोसे की राजनीति सबसे बड़ा प्रश्न बनती है। जब सहयोग और मुकाबला एक साथ चलता है तो कार्यकर्ता और मतदाता दोनों के बीच भ्रम पैदा होता है, और यही भ्रम विपक्षी एकता को कमजोर करता है।

आगे की दिशा: दो मोर्चों पर जंग

राजनीतिक संकेत बताते हैं कि बीजेपी के साथ AAP का वैचारिक संघर्ष आगे भी जारी रहेगा, लेकिन निकट भविष्य में कांग्रेस के साथ प्रतिस्पर्धा अधिक तीखी हो सकती है। क्षेत्रीय चुनावों में विस्तार की रणनीति कांग्रेस के आधार को सीधे प्रभावित करती है, जिससे दोनों दलों के बीच टकराव स्वाभाविक है।

विपक्षी एकता की राजनीति के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है। परस्पर अविश्वास बीजेपी के खिलाफ साझा रणनीति को कमजोर करता है। यदि AAP राष्ट्रीय विकल्प बनने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है तो उसे गठबंधन और प्रतिस्पर्धा के बीच स्पष्टता लानी होगी, अन्यथा राजनीतिक अलगाव का खतरा भी बना रहेगा।

भारतीय राजनीति में स्थायी दोस्ती या दुश्मनी नहीं होती, लेकिन विश्वसनीयता हर दौर में निर्णायक होती है। बीजेपी के साथ केजरीवाल का टकराव पुराना और निरंतर है, लेकिन कांग्रेस के साथ बढ़ता अविश्वास विपक्षी राजनीति को और जटिल बना रहा है।

आज की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह रणनीतिक बयानबाजी है या बदलते समीकरणों में भरोसे का संकट। क्योंकि अंततः राजनीति में सबसे मजबूत पूंजी पद या सत्ता नहीं, बल्कि विश्वास होता है — और जब विश्वास पर सवाल उठते हैं तो किसी भी आदमी की सियासी यात्रा कठिन हो जाती है।

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