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क्या इजरायल दौरे से भारत की रणनीतिक ताकत बढ़ेगी या ईरान की नाराजगी नई कूटनीतिक चुनौती बनेगी?

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एबीसी नेशनल न्यूज | तेहरान / तेल अवीव / नई दिल्ली | 26 फरवरी 2026

2026 में प्रधानमंत्री Narendra Modi का इजरायल दौरा ऐसे समय हुआ जब पश्चिम एशिया पहले से ही युद्ध, अविश्वास और शक्ति संतुलन की राजनीति से गुजर रहा है। इस दौरे ने एक बार फिर भारत की “डे-हाइफनेशन” नीति — यानी इजरायल और फिलिस्तीन के साथ अलग-अलग संबंध बनाए रखने — को केंद्र में ला दिया है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi द्वारा इस दौरे को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया जाना यह संकेत देता है कि भारत की संतुलन साधने वाली कूटनीति आसान नहीं रहने वाली। यह दौरा रणनीतिक दृष्टि से भारत के हितों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है, लेकिन क्षेत्रीय संवेदनशीलता और पारंपरिक संतुलन को संभालना पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण दिखाई देता है।

रणनीतिक और रक्षा सहयोग: क्या भारत को मिला बड़ा फायदा?

इजरायल लंबे समय से भारत का प्रमुख रक्षा और तकनीकी साझेदार रहा है। ऐसे में यह दौरा केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि व्यावहारिक महत्व रखता है। रक्षा तकनीक, साइबर सुरक्षा, कृषि नवाचार और स्टार्ट-अप सहयोग जैसे क्षेत्रों में साझेदारी भारत की सुरक्षा और आर्थिक क्षमता को मजबूत कर सकती है। आतंकवाद विरोधी सहयोग भी दोनों देशों के रिश्तों की अहम कड़ी है। इस संदर्भ में यह दौरा अत्याधुनिक तकनीक, खुफिया सहयोग और सामरिक समर्थन को और गहरा करने वाला कदम माना जा रहा है, जो बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल में महत्वपूर्ण है।

आर्थिक और भू-राजनीतिक लाभ: क्या भारत क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ा रहा है?

इजरायल के साथ बढ़ती साझेदारी केवल रक्षा तक सीमित नहीं है। भारत-मिडिल ईस्ट-यूरोप आर्थिक गलियारे जैसी पहलों में इजरायल की भूमिका भारत के लिए व्यापार और कनेक्टिविटी के नए अवसर खोल सकती है। साथ ही भारत का खाड़ी देशों, अमेरिका और यूरोप के साथ समानांतर संबंध बनाए रखना यह दर्शाता है कि नई दिल्ली किसी एक ध्रुव पर निर्भर रहने के बजाय बहु-ध्रुवीय संतुलन की नीति अपना रही है। यह रुख स्वतंत्र और हित-आधारित विदेश नीति का संकेत माना जा रहा है।

ईरान की नाराजगी: क्या ऊर्जा और रणनीतिक संतुलन पर असर पड़ेगा?

इजरायल के साथ निकटता का दूसरा पहलू ईरान की संवेदनशील प्रतिक्रिया है। ईरान भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति, चाबहार बंदरगाह और मध्य एशिया तक संपर्क के लिहाज से अहम साझेदार रहा है। तेहरान की असहजता यह संकेत देती है कि भारत को अपने पश्चिम एशिया संतुलन को अधिक सावधानी से संभालना होगा। यदि यह नाराजगी बढ़ती है तो ऊर्जा आपूर्ति, क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं और रणनीतिक संवाद पर प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि भारत अब तक दोनों देशों के साथ अलग-अलग रिश्ते बनाए रखने में सफल रहा है, लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव इस संतुलन को अधिक जटिल बना रहा है।

फिलिस्तीन प्रश्न: क्या भारत की पारंपरिक छवि पर सवाल उठ रहे हैं?

भारत ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीन के समर्थन और दो-राष्ट्र समाधान की वकालत करता रहा है। ऐसे में इजरायल के साथ बढ़ती निकटता को कुछ हलकों में फिलिस्तीन से दूरी के रूप में देखा जा रहा है। विपक्षी दलों और नागरिक समूहों ने मानवीय संकट के बीच इजरायल के साथ करीबी संदेश को लेकर चिंता जताई है। हालांकि भारतीय नेतृत्व ने फिलिस्तीन के लिए मानवीय सहायता और शांति प्रयासों के समर्थन को दोहराया है, फिर भी धारणा प्रबंधन कूटनीति का अहम हिस्सा बन गया है।

जनमत और हितधारकों की मानसिकता: संतुलित समर्थन या बढ़ती चिंता?

देश के भीतर प्रतिक्रिया मिश्रित दिखाई दे रही है। रणनीतिक समुदाय इस दौरे को व्यावहारिक और आवश्यक मानता है, जबकि कुछ राजनीतिक दल और नागरिक समूह मानवीय और नैतिक पहलुओं पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। खाड़ी देशों में कार्यरत भारतीयों और ऊर्जा बाजार से जुड़े हितधारकों के लिए क्षेत्रीय स्थिरता सर्वोच्च प्राथमिकता है, इसलिए वे संभावित तनाव को लेकर सतर्क नजर रखे हुए हैं। ऐसे में समर्थन और चिंता दोनों भावनाएं समानांतर रूप से दिखाई देती हैं।

भारत के लिए आगे की राह: संतुलन ही सबसे बड़ी कूटनीतिक पूंजी

वर्तमान परिस्थिति में इजरायल के साथ रणनीतिक सहयोग जारी रखने के साथ-साथ ईरान के साथ संवाद को मजबूत करना और फिलिस्तीन के लिए मानवीय व कूटनीतिक समर्थन को स्पष्ट रूप से बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। साथ ही घरेलू स्तर पर विदेश नीति के उद्देश्यों को स्पष्ट करना भी आवश्यक है, ताकि अनावश्यक भ्रम और राजनीतिक ध्रुवीकरण कम हो सके।

अवसर और चुनौती साथ-साथ

इजरायल दौरा भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और आत्मविश्वास का संकेत देता है, लेकिन पश्चिम एशिया की जटिल राजनीति यह भी दर्शाती है कि हर रणनीतिक लाभ के साथ संतुलन की परीक्षा जुड़ी होती है। बहुपक्षीय संवाद, मानवीय प्रतिबद्धता और स्वतंत्र विदेश नीति को समान रूप से आगे बढ़ाने की स्थिति में यह दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत की क्षेत्रीय शांति-निर्माता छवि को भी मजबूत कर सकता है।

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