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WATCH VIDEO — पूर्व थलसेनाध्यक्ष के हवाले से राहुल गांधी ने उड़ाई सरकार की धज्जियां : मोदी – राजनाथ – शाह – ओम बिरला के फ़ाख़्ते उड़े

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एबीसी नेशनल न्यूज | 2 फरवरी 2026

नई दिल्ली। लोकसभा के बजट सत्र के दौरान सोमवार को संसद उस समय अभूतपूर्व राजनीतिक उथल-पुथल की गवाह बनी, जब नेता विपक्ष Rahul Gandhi ने पूर्व थलसेनाध्यक्ष MM Naravane की एक अप्रकाशित आत्मकथा के अंशों का हवाला देते हुए केंद्र की मोदी सरकार पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर और संवेदनशील सवाल उठाने की कोशिश की। राहुल गांधी जैसे ही डोकलाम और 2020 के पूर्वी लद्दाख गतिरोध का संदर्भ रखते हुए अपनी बात आगे बढ़ाने लगे, सत्ता पक्ष की बेंचों से तेज़ आपत्तियाँ शुरू हो गईं। कुछ ही पलों में सदन का माहौल पूरी तरह अशांत हो गया और अंततः लोकसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।

राहुल गांधी ने अपने वक्तव्य में दावा किया कि जनरल नरवणे की आने वाली किताब में लद्दाख संकट के दौरान चीनी टैंकों की मूवमेंट, सेना द्वारा राजनीतिक नेतृत्व से स्पष्ट निर्देश मांगे जाने और सरकार की ओर से ठोस दिशा-निर्देश न मिलने का उल्लेख है। उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की कि उस दौर में ज़मीनी हालात को लेकर सेना असमंजस की स्थिति में थी और उसे राजनीतिक नेतृत्व से स्पष्ट संदेश का इंतज़ार करना पड़ा। राहुल गांधी जैसे ही किताब के कथित उद्धरण पढ़ने लगे, सत्ता पक्ष ने आरोप लगाया कि वे एक अप्रकाशित और अप्रमाणित दस्तावेज़ के ज़रिये सदन को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।

सरकार की ओर से बौखलाया हुआ विरोध रक्षा मंत्री Rajnath Singh ने दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि किसी अप्रकाशित पुस्तक या ऐसे दस्तावेज़ का हवाला देना, जिसे अभी तक आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं किया गया है, संसद के नियमों का उल्लंघन है, विशेषकर तब जब मामला सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो। इसके बाद गृह मंत्री Amit Shah और Bharatiya Janata Party के अन्य सांसद भी अपनी सीटों से खड़े हो गए और राहुल गांधी पर सेना और सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाने लगे। जबकि सब ढकोसला से अधिक कुछ भी नहीं था। शोर-शराबा इतना बढ़ गया कि स्पीकर को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ा, लेकिन स्थिति नियंत्रण में नहीं आ सकी। स्पीकर तो खुद बहुत पक्षपाती रवैया अपनाने के लिए मशहूर हैं। बीजेपी सरकार या मोदी को जब भी जवाब नहीं सूझता है तो ओम बिरला खिसियाने और बौखलाए से विपक्ष की आवाज को दबाते रहते हैं।

हंगामे के बीच राहुल गांधी ने सत्ता पक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि सरकार बहस से भाग रही है और सच्चाई सामने आने से डर रही है। उनका आरोप था कि पूर्व आर्मी चीफ के अनुभव और शब्दों में उस दौर की सच्चाई दर्ज है, जो यह बताती है कि राजनीतिक नेतृत्व ने सेना को पूरी तरह “फ्री हैंड” नहीं दिया। राहुल गांधी ने यह सवाल भी उठाया कि यदि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो फिर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे पर खुली चर्चा से क्यों बचा जा रहा है। हालांकि सत्ता पक्ष के लगातार विरोध के कारण उन्हें अपनी बात पूरी करने का अवसर नहीं मिला और सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गई।

संसद के बाहर मीडिया से बातचीत करते हुए राहुल गांधी ने अपने आरोपों को और तीखा करते हुए कहा कि यह मुद्दा किसी एक पार्टी या राजनीतिक दल से ऊपर है और सीधे देश की सुरक्षा तथा सेना के सम्मान से जुड़ा हुआ है। उनका दावा था कि सरकार ने जानबूझकर उन्हें संसद में बोलने से रोका, क्योंकि पूर्व थलसेनाध्यक्ष की किताब में दर्ज तथ्यों से मोदी सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। कांग्रेस नेताओं ने भी इसे लोकतांत्रिक चर्चा को दबाने की कोशिश बताया और कहा कि संसद में सवाल पूछना विपक्ष का संवैधानिक अधिकार है।

विवाद के केंद्र में आई किताब Four Stars of Destiny जनरल एमएम नरवणे की आत्मकथा बताई जा रही है, जो फिलहाल अप्रकाशित है और सरकारी क्लियरेंस का इंतज़ार कर रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, किताब में 2020 के लद्दाख संकट, चीनी सेना की गतिविधियों और उस समय लिए गए रणनीतिक फैसलों का विवरण है। हालांकि जनरल नरवणे अपने सार्वजनिक बयानों में पहले यह कह चुके हैं कि भारत ने कोई ज़मीन नहीं खोई और सेना को पर्याप्त स्वतंत्रता मिली थी। किताब के कथित विवादास्पद हिस्से अभी तक सार्वजनिक नहीं हुए हैं, जिससे पूरे विवाद को लेकर अटकलों और राजनीतिक बयानबाज़ी का दौर जारी है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर संसद में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बहस की सीमाओं और संसदीय नियमों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस इसे सरकार की “चुप्पी और असहजता” का प्रमाण बता रही है, जबकि सरकार का कहना है कि विपक्ष जानबूझकर अधूरी और अप्रमाणित जानकारी के आधार पर देश और सेना को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है। फिलहाल, किताब के प्रकाशित होने तक इस विवाद पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना संभव नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में संसद और सियासत—दोनों में सियासी तापमान ऊँचा बनाए रखेगा।

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