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मासिक धर्म स्वच्छता मौलिक अधिकार

मासिक धर्म स्वच्छता मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी पैड अनिवार्य

सुमन कुमार | 31 जनवरी 2026

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील मुद्दे पर साफ संदेश दिया है। अदालत ने कहा है कि मासिक धर्म से जुड़ी स्वच्छता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है। कोर्ट के मुताबिक, यह विषय लड़कियों और महिलाओं की गरिमा, सेहत और बराबरी से सीधे जुड़ा हुआ है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि हर स्कूल में किशोरियों को मुफ्त और बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं। यह व्यवस्था कक्षा 6 से 12 तक पढ़ने वाली सभी छात्राओं के लिए अनिवार्य होगी।

अदालत ने माना कि मासिक धर्म को लेकर समाज में मौजूद झिझक और स्कूलों में जरूरी सुविधाओं की कमी का सीधा असर लड़कियों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और निजी सम्मान पर पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने सभी स्कूलों में अलग-अलग और साफ-सुथरे शौचालय सुनिश्चित करने का भी आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ को पूरे देश में लागू करने को कहा है। यह आदेश सिर्फ सरकारी नहीं, बल्कि निजी स्कूलों पर भी समान रूप से लागू होगा।

कोर्ट ने साफ चेतावनी दी है कि अगर कोई निजी स्कूल इन निर्देशों का पालन नहीं करता—जैसे लड़कियों के लिए अलग शौचालय न होना या मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध न कराना—तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है।

यह फैसला स्कूलों में बेहतर स्वच्छता सुविधाओं और मुफ्त सैनिटरी पैड की मांग से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। इसे देशभर की लाखों छात्राओं के लिए राहत देने वाला और शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक जरूरी कदम माना जा रहा है।

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