सुमन कुमार | 15 जनवरी 2026
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) से जुड़े मामले ने अब संवैधानिक और कानूनी टकराव का रूप ले लिया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जांच के दौरान जबरन दस्तावेज अपने साथ ले लिए और एजेंसी के काम में दखल दिया। ED का कहना है कि यह केवल जांच में बाधा नहीं, कानून व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को कमजोर करने का गंभीर मामला है। ED के इन आरोपों पर वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से जोरदार जवाब दिया। सिब्बल ने अदालत में साफ कहा कि मुख्यमंत्री कोई फाइल या सरकारी दस्तावेज लेकर नहीं गई थीं, उनके पास सिर्फ उनका लैपटॉप और मोबाइल फोन था। उन्होंने कहा कि ED जिस तरह से पूरे घटनाक्रम को पेश कर रही है, वह तथ्यात्मक रूप से गलत और राजनीतिक रूप से प्रेरित है।
इस पूरे मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त टिप्पणी की। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है और इससे संवैधानिक संतुलन से जुड़े सवाल खड़े होते हैं। कोर्ट ने संकेत दिया कि वह इस प्रकरण में केंद्र सरकार को नोटिस जारी करेगा और पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी मांगेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी जांच एजेंसी को कानून के दायरे में रहकर काम करना होगा और वहीं किसी निर्वाचित मुख्यमंत्री की भूमिका को भी कानून के तहत ही परखा जाएगा।
ममता बनर्जी का पक्ष यह है कि उन्होंने राज्य के अधिकारों और संघीय ढांचे की रक्षा के लिए हस्तक्षेप किया, जबकि ED का कहना है कि मुख्यमंत्री ने जांच प्रक्रिया में सीधे दखल देकर कानून को अपने हाथ में लिया। इस टकराव ने एक बार फिर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच एजेंसियों के इस्तेमाल को लेकर चल रही राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं। माना जा रहा है कि अदालत का रुख न सिर्फ इस मामले की दिशा तय करेगा, बल्कि भविष्य में जांच एजेंसियों और निर्वाचित सरकारों के बीच सीमा रेखा भी स्पष्ट करेगा।




