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लगभग 6 साल बाद गुल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर और शिफा उर रहमान तिहाड़ जेल से रिहा, Video में देखें खुशियों का समा

अंतरराष्ट्रीय/नेशनल डेस्क | 8 जनवरी 2026

2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े चर्चित ‘बड़ी साजिश’ मामले में आरोपी छात्र कार्यकर्ता गुल्फिशा फातिमा, मीरान हैदर और शिफा उर रहमान को आखिरकार तिहाड़ जेल से रिहा कर दिया गया है। लगभग 5 साल 9 महीने तक जेल में रहने के बाद 7 जनवरी 2026 को इन लोगों की रिहाई हुई। यह रिहाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 जनवरी 2026 को दी गई जमानत के बाद संभव हो पाई। रिहाई के साथ ही यह मामला एक बार फिर देश की राजनीति, न्याय व्यवस्था और लंबे समय तक विचाराधीन कैद के सवालों को केंद्र में ले आया है।

अप्रैल 2020 में गिरफ्तारी, UAPA समेत गंभीर आरोप

गुल्फिशा फातिमा समेत सभी को अप्रैल 2020 में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उन पर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं को संगठित करने, धरना-प्रदर्शन की लॉजिस्टिक्स संभालने और उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की कथित साजिश में शामिल होने के आरोप लगाए गए थे। इस मामले में उनके खिलाफ UAPA (अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट) और IPC की कई गंभीर धाराएं लगाई गईं, जिसके चलते उन्हें लंबे समय तक जमानत नहीं मिल सकी।

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

5 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने गुल्फिशा फातिमा समेत पांच आरोपियों—मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद—को जमानत दी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इन आरोपियों की भूमिका ‘सहायक और सहायक स्तर’ (supportive role) की थी, न कि किसी तरह की स्वतंत्र कमांड, रणनीतिक नियंत्रण या बड़े स्तर पर साजिश का संचालन।

कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की कि गुल्फिशा फातिमा ने स्थानीय स्तर पर महिलाओं को जुटाने और व्यवस्थागत काम संभालने में भूमिका निभाई, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उनके पास कई प्रदर्शन स्थलों पर नियंत्रण या उच्चस्तरीय साजिश की कमान थी।

उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत नहीं

इसी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सह-आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि इन दोनों की भूमिका ‘केंद्रीय और उच्च स्तर’ की प्रतीत होती है, इसलिए उन्हें इस स्तर पर जमानत नहीं दी जा सकती। इस अंतर ने अदालत के उस दृष्टिकोण को रेखांकित किया, जिसमें हर आरोपी की भूमिका को अलग-अलग आधार पर परखा गया।

जमानत की सख्त शर्तें

गुल्फिशा फातिमा को दी गई जमानत कई कड़ी शर्तों के साथ है। उन्हें ₹2 लाख का बेल बॉन्ड और दो स्थानीय जमानतदार देने होंगे। इसके अलावा वे ट्रायल कोर्ट की अनुमति के बिना दिल्ली की सीमाओं से बाहर नहीं जा सकतीं। किसी भी तरह की रैली, सार्वजनिक सभा, भाषण या पोस्टर-बैनर व डिजिटल प्रचार पर पूरी तरह रोक लगाई गई है। कोर्ट ने साफ किया है कि किसी भी शर्त के उल्लंघन पर जमानत तुरंत रद्द की जा सकती है।

रिहाई की प्रक्रिया और तिहाड़ से बाहर आना

7 जनवरी को कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर बाजपेयी ने जमानत बॉन्ड स्वीकार किए, जिसके बाद गुल्फिशा फातिमा को तिहाड़ जेल से रिहा किया गया। उनके साथ मीरान हैदर और शिफा-उर-रहमान भी तिहाड़ से बाहर आए, जबकि मोहम्मद सलीम खान को मंडोली जेल से रिहा किया गया। शादाब अहमद ने समाचार लिखे जाने तक जमानत बॉन्ड जमा नहीं किया था। रिहाई के बाद गुल्फिशा के परिवार से मिलने के वीडियो और तस्वीरें भी सामने आईं।

2020 दंगों की पृष्ठभूमि

फरवरी 2020 में CAA-NRC के विरोध के दौरान उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। दिल्ली पुलिस ने इन घटनाओं को एक ‘बड़ी साजिश’ करार देते हुए कई छात्र कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामले दर्ज किए थे।

ट्रायल जारी, जमानत का मतलब बरी होना नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि जमानत का मतलब दोषमुक्ति नहीं है। मामला अभी ट्रायल में है और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया है कि सुनवाई को जल्द पूरा किया जाए। कानूनी जानकारों के मुताबिक, गुल्फिशा फातिमा की रिहाई लंबी विचाराधीन कैद और UAPA के इस्तेमाल पर एक बार फिर बहस को तेज कर सकती है।

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