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ओपिनियन | व्यापम की छाया में नैतिकता का उपदेश: मनरेगा पर शिवराज का बयान पाखंड क्यों लगता है

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आलोक कुमार | नई दिल्ली | 4 जनवरी 2026

जिस राज्य में व्यापम जैसा संगठित घोटाला सामने आया—जहां भर्ती और परीक्षाओं की दलाली ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को भीतर तक खोखला कर दिया, और जहां इस घोटाले से जुड़े मामलों में 100 से अधिक लोगों की रहस्यमय मौतें दर्ज हुईं—उसी राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान आज देश को यह पाठ पढ़ा रहे हैं कि मनरेगा भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी थी। यह केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि नैतिक साहस की कमी और चयनात्मक स्मृति (selective memory) का जीवंत उदाहरण है। व्यापम कोई सामान्य अनियमितता नहीं थी; यह एक सुव्यवस्थित नेटवर्क था, जिसमें मेडिकल, इंजीनियरिंग, शिक्षक भर्ती और सरकारी नौकरियों तक को पैसे और रसूख के दम पर बेचा गया। वर्षों तक यह तंत्र कैसे चलता रहा—इस पर जांच एजेंसियों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लगातार सवाल उठाए। सबसे बुनियादी प्रश्न तब भी अनुत्तरित रहा और आज भी है—जवाबदेही किसकी थी? उस दौर में शिवराज चौहान न केवल मुख्यमंत्री थे, बल्कि “मामा” की नैतिक छवि गढ़कर खुद को सुशासन का प्रतीक भी बताते रहे। मगर जैसे-जैसे व्यापम की परतें खुलीं, वही छवि सबसे पहले दरकती दिखी।

आज वही नेता मनरेगा जैसी अधिकार-आधारित योजना को भ्रष्टाचार का पर्याय बताकर खारिज करने की भाषा बोल रहे हैं। यह वही मनरेगा है जिसने सूखा, महामारी और बेरोज़गारी के कठिन दौर में करोड़ों गरीब परिवारों को न्यूनतम आय की गारंटी दी; यह वही योजना है जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर rights-based social security model के रूप में पहचाना गया। क्या मनरेगा में भ्रष्टाचार हुआ? निस्संदेह हुआ। लेकिन असली सवाल यह है कि भ्रष्टाचार का दोष योजना का है या उसके क्रियान्वयन का? अगर किसी सार्वजनिक नीति में खामियां उजागर हों, तो लोकतांत्रिक रास्ता सुधार और जवाबदेही का होता है—न कि उस नीति की हत्या का।

शिवराज चौहान का बयान सुधार की भाषा कम और राजनीतिक वैमनस्य तथा वैचारिक शत्रुता की अभिव्यक्ति अधिक प्रतीत होता है। मनरेगा को बदनाम करना उस सामाजिक दर्शन पर प्रहार है, जिसमें राज्य गरीब नागरिक के प्रति जवाबदेह होता है और मज़दूर को काम मांगने का अधिकार मिलता है—दया नहीं। यही वह अधिकार-आधारित सोच है जिसे कमजोर करने की कोशिशें लंबे समय से चल रही हैं, और मनरेगा उस सोच का सबसे ठोस प्रतीक रहा है।

विडंबना यह है कि जिन अनियमितताओं की दुहाई दी जा रही है, उन पर सीएजी रिपोर्ट्स, संसदीय समितियां और न्यायिक टिप्पणियां पहले ही निगरानी तंत्र मजबूत करने की बात कह चुकी हैं। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने सुधार की जगह बजट कटौती, भुगतान में देरी और अब वैचारिक हमलों का रास्ता चुना। यह सुधार नहीं, बल्कि संस्थागत पलायन (institutional retreat) है—जहां समस्या के समाधान के बजाय नीति को ही दोषी ठहराया जा रहा है।

सबसे असहज प्रश्न अब भी बना हुआ है: व्यापम जैसे घोटाले की राजनीतिक और नैतिक जिम्मेदारी कब तय होगी? न कोई सार्वजनिक आत्ममंथन, न कोई माफी, न ही स्पष्ट जवाबदेही। ऐसे में मनरेगा पर प्रवचन देना वैसा ही लगता है जैसे आग लगाने वाला फायर सेफ्टी पर भाषण दे। लोकतंत्र में सवाल पूछना विपक्ष का विशेषाधिकार नहीं, जनता का अधिकार है—और जनता यह पूछने में पूरी तरह जायज़ है कि पहले व्यापम का हिसाब कौन देगा?

मनरेगा पर बहस होनी चाहिए, सुधार होने चाहिए—लेकिन जब यह बहस व्यापम की लंबी छाया में खड़े होकर की जाती है, तो वह नीति-निर्माण नहीं, पाखंड बन जाती है। और पाखंड, चाहे कितना भी ऊंचे पद से आए, अंततः लोकतंत्र को ही कमजोर करता है।

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