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ओपिनियन | मनरेगा को खत्म करने की साज़िश: गरीबों से अधिकार छीनने का नया रास्ता

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एबीसी डेस्क | 18 दिसंबर 2025

काग़ज़ पर नाम बदला है, शब्द बदले हैं, आंकड़े सजाए गए हैं—लेकिन असलियत वही पुरानी है: गरीब से उसका अधिकार छीना जा रहा है। ‘विकसित भारत–जी राम जी बिल’ को जिस तरह “नई इबारत” बताकर पेश किया जा रहा है, वह दरअसल मनरेगा को धीरे-धीरे दफन करने की सोची-समझी रणनीति है। यह बदलाव सिर्फ एक कानून का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो मानती है कि गरीब को अधिकार नहीं, सिर्फ दया मिलनी चाहिए।

मनरेगा कोई साधारण सरकारी योजना नहीं थी। यह रोज़गार का अधिकार था—कानून द्वारा सुरक्षित। गांव का कोई आदमी, कोई महिला, कोई बुज़ुर्ग जब काम मांगता था, तो सरकार बाध्य थी कि उसे काम दे। यही मनरेगा की आत्मा थी। यही वजह है कि सूखा हो, बाढ़ हो या महामारी—मनरेगा गरीब के लिए आख़िरी सहारा बना। कोरोना के अंधेरे दौर में, जब शहरों की चमक बुझ गई थी, तब गांवों में मनरेगा ने चूल्हे जलाए थे।

अब कहा जा रहा है—100 दिन नहीं, 125 दिन काम मिलेगा। सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि दिन कितने हैं, सवाल यह है कि काम का अधिकार है या नहीं? नया कानून इस बुनियादी सवाल से चुपचाप बच निकलता है। जहां मनरेगा में “काम मांगने पर काम देना” सरकार की कानूनी जिम्मेदारी थी, वहीं नए ढांचे में रोज़गार को बजट, राज्यों की मर्ज़ी और प्रशासनिक फैसलों के हवाले कर दिया गया है। यानी काग़ज़ पर 125 दिन, ज़मीन पर शून्य भी हो सकता है।

सबसे खतरनाक बदलाव है फंडिंग का नया फार्मूला। पहले मजदूरी का पूरा बोझ केंद्र सरकार उठाती थी। अब राज्यों से कहा जा रहा है—40 फीसदी आप दीजिए। जिन राज्यों की आर्थिक हालत पहले से खराब है, वे यह बोझ कैसे उठाएंगे? नतीजा साफ है—काम कम होगा, भुगतान देर से होगा, और फिर कहा जाएगा कि “लोगों की मांग ही नहीं है।” यह वही तरीका है, जिससे किसी योजना को बिना बंद किए, धीरे-धीरे मार दिया जाता है।

‘एग्रीकल्चर पॉज’ जैसे प्रावधान भी इसी दिशा में इशारा करते हैं। बुआई और कटाई के समय 60 दिन तक काम रोकने की छूट—काग़ज़ पर संतुलन, ज़मीन पर मजदूर की मजबूरी। खेती के मौसम में काम बंद, बाकी समय राज्यों के पास पैसे नहीं—तो गरीब जाए तो जाए कहां? यही वह खामोश जाल है, जिसमें मजदूर को फंसाया जा रहा है।

प्रियंका गांधी का यह कहना बिल्कुल सही है कि यह गरीबों से रोज़गार छीनने की साज़िश है। और मल्लिकार्जुन खड़गे का सवाल और भी सीधा है—जब अधिकार ही खत्म कर दिया गया, तो नाम बदलने से क्या हासिल? मनरेगा ने दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और महिलाओं को सिर्फ काम नहीं दिया था, सम्मान दिया था। बैंक खाते में आने वाली मज़दूरी ने उन्हें साहूकारों की दया से मुक्त किया था। अब उसी आत्मसम्मान पर चोट की जा रही है।

सरकार इसे ‘विकसित भारत 2047’ का रास्ता बता रही है। लेकिन एक बुनियादी सवाल है—क्या गरीब को अधिकार से वंचित करके कोई देश विकसित बन सकता है? विकास का मतलब अगर सिर्फ आंकड़े, ऐप और तकनीक है, तो यह विकास खोखला है। असली विकास वह होता है, जहां सबसे कमजोर आदमी भी यह भरोसा रख सके कि संकट के समय उसके पास एक कानूनी सहारा है।

मनरेगा को कमजोर करना, दरअसल उस विचार को कमजोर करना है कि राज्य अपने नागरिक के प्रति जवाबदेह है। आज अगर यह अधिकार छीना गया, तो कल शिक्षा, स्वास्थ्य और भोजन पर भी यही तर्क लागू होगा—“बजट नहीं है, राज्यों पर बोझ है।” यही कारण है कि यह लड़ाई किसी एक योजना की नहीं है। यह लड़ाई अधिकार बनाम कृपा, सम्मान बनाम मजबूरी, और संविधान की आत्मा बनाम बाजारू सोच की है।

गरीब को 25 दिन का सपना दिखाकर उसका कानूनी हक छीन लेना—यह सुधार नहीं, धोखा है। और इस धोखे को पहचानना, उसका विरोध करना, आज सिर्फ विपक्ष का नहीं, हर संवेदनशील नागरिक का कर्तव्य है। क्योंकि आज अगर मनरेगा गया, तो कल गरीब की आवाज़ भी खामोश कर दी जाएगी।

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