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PMML–नेहरू कागज़ात विवाद: BJP का झूठ धराशायी, संसद में मोदी सरकार ने माना—कोई दस्तावेज़ गायब नहीं

आलोक कुमार । नई दिल्ली 16 दिसंबर 2025

प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय (PMML) से भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़े कथित तौर पर “51 डिब्बे दस्तावेज़ गायब होने” के आरोपों पर अब सच आधिकारिक रूप से सामने आ चुका है। लोकसभा में पूछे गए तारांकित प्रश्न संख्या 213 के लिखित उत्तर में मोदी सरकार के संस्कृति मंत्री ने साफ़ कर दिया है कि वर्ष 2025 के दौरान PMML के वार्षिक निरीक्षण में नेहरू जी से संबंधित कोई भी दस्तावेज़ गायब नहीं पाया गया। इस सरकारी जवाब के साथ ही BJP द्वारा वर्षों से फैलाया जा रहा वह नैरेटिव ढह गया है, जिसमें यह दावा किया जा रहा था कि श्रीमती सोनिया गांधी ने PMML से नेहरू जी के कागज़ात निकलवा लिए थे।

कांग्रेस ने इस खुलासे के बाद BJP और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा हमला बोलते हुए कहा है कि यह पूरा मामला झूठ, साजिश और सुनियोजित प्रोपेगेंडा का उदाहरण है। कांग्रेस का कहना है कि जब संसद के पटल पर सरकार खुद मान रही है कि कोई दस्तावेज़ गायब नहीं हुआ, तो BJP को देश से और विशेषकर नेहरू परिवार से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। पार्टी ने आरोप लगाया कि यह झूठ केवल राजनीतिक लाभ के लिए गढ़ा गया, ताकि इतिहास को बदनाम किया जा सके और विपक्षी नेताओं की छवि धूमिल की जा सके।

दरअसल, इस पूरे विवाद की शुरुआत BJP की ओर से किए गए उन आरोपों से हुई थी, जिनमें कहा गया था कि PMML से 51 डिब्बों में भरकर नेहरू जी के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ हटा लिए गए। इस आरोप को आगे बढ़ाते हुए BJP सांसद संबित पात्रा ने संसद में सवाल उठाया था कि क्या प्रधानमंत्री संग्रहालय और पुस्तकालय से नेहरू जी से जुड़े दस्तावेज़ गायब हैं। उस समय इस सवाल को मीडिया के एक बड़े हिस्से ने बिना तथ्यात्मक जांच के प्रमुखता से चलाया और इसे एक “बड़े खुलासे” की तरह पेश किया गया।

लेकिन अब, 15 दिसंबर 2025 को दिए गए लिखित उत्तर में संस्कृति मंत्रालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि PMML के वार्षिक निरीक्षण के दौरान नेहरू जी से संबंधित किसी भी दस्तावेज़ के गायब होने की पुष्टि नहीं हुई। यही नहीं, सरकार ने यह भी कहा कि PMML की वार्षिक आम बैठक में भी दस्तावेज़ों की अनुपलब्धता को लेकर कोई निर्णय नहीं लिया गया, यानी पूरा आरोप आधारहीन था।

कांग्रेस का कहना है कि यह मामला केवल एक झूठे बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संस्थागत बदनामी और इतिहास के साथ छेड़छाड़ की कोशिश है। पार्टी नेताओं ने सवाल उठाया कि जब यह आरोप पूरी तरह गलत था, तो इसे इतने ज़ोर-शोर से क्यों फैलाया गया? क्या इसका मकसद देश के पहले प्रधानमंत्री की विरासत को बदनाम करना और गांधी परिवार के खिलाफ नफरत का माहौल बनाना नहीं था?

इस पूरे प्रकरण में मीडिया की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि उस वक्त कई मीडिया संस्थानों ने प्रधानमंत्री कार्यालय से आए कथित व्हाट्सएप संदेशों के आधार पर खबरें चला दीं, बिना यह जांचे कि आरोपों का कोई दस्तावेज़ी या आधिकारिक आधार है या नहीं। अब जब संसद के रिकॉर्ड में सच्चाई दर्ज हो चुकी है, तो सवाल उठता है—

* क्या वही मीडिया अब इस सच को उतनी ही प्रमुखता से दिखाएगा?
* क्या BJP द्वारा फैलाए गए इस झूठे प्रोपेगेंडा की जिम्मेदारी तय होगी?
* और क्या मीडिया इस पूरे मामले को एक राजनीतिक साजिश के रूप में उजागर करेगा?

कांग्रेस का कहना है कि यह मामला बताता है कि कैसे झूठ को बार-बार दोहराकर सच बनाने की कोशिश की जाती है, और कैसे संवैधानिक संस्थाओं के नाम पर राजनीतिक नैरेटिव गढ़े जाते हैं। पार्टी ने दो टूक कहा है कि अब जबकि सच्चाई संसद के रिकॉर्ड में दर्ज हो चुकी है, BJP का यह झूठ पूरी तरह बेनकाब हो गया है और नरेंद्र मोदी सरकार को इस पूरे प्रकरण पर जवाबदेही तय करनी होगी।

कुल मिलाकर, PMML–नेहरू दस्तावेज़ विवाद अब एक नए मोड़ पर है—जहां आरोप लगाने वालों की विश्वसनीयता कटघरे में है, और सवाल सिर्फ यह नहीं कि झूठ क्यों फैलाया गया, बल्कि यह भी कि लोकतंत्र में झूठे प्रोपेगेंडा की कीमत कौन और कैसे चुकाएगा।

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