प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री । नई दिल्ली 16 दिसंबर 2025
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाक़ात देखने में बेहद शानदार रही। लाल कालीन, गार्ड ऑफ ऑनर, गर्मजोशी भरी मुलाक़ात और कैमरों के सामने दोस्ती के बड़े संदेश—सब कुछ वैसा ही था जैसा किसी बड़े वैश्विक शिखर सम्मेलन में होता है। तस्वीरें यह बताने के लिए काफी थीं कि भारत दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि वह अपने फैसले खुद करता है, चाहे अमेरिका कितना ही दबाव क्यों न बनाए। खास तौर पर तब, जब डोनाल्ड ट्रंप भारत पर टैरिफ बढ़ाने और रणनीतिक दबाव बनाने की बात कर रहे हैं।

लेकिन जब इस चमक-दमक को हटाकर असली नतीजों को देखा जाए, तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखती है। इस शिखर बैठक से बड़ी घोषणाएं तो हुईं, लेकिन ठोस आर्थिक फैसले कम नजर आए। मोदी–पुतिन मुलाक़ात में दोस्ती और भरोसे की बात तो खूब हुई, लेकिन व्यापार और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर बहुत बड़ा बदलाव दिखता नहीं है।
दिखावा ज़्यादा, नतीजे कम
यह सच है कि पुतिन का यह दौरा खास था, क्योंकि रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद यह उनकी भारत की पहली यात्रा थी। भारत ने भी उनका स्वागत पूरे सम्मान और गर्मजोशी से किया। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-रूस रिश्ते को “ध्रुव तारा” बताया—यानी हमेशा रास्ता दिखाने वाला सितारा। लेकिन बड़े शब्दों और भावनात्मक बयानों के बावजूद, नई बड़ी डिफेंस डील या परमाणु, अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में कोई ताज़ा समझौता सामने नहीं आया। ज़्यादातर समझौते पहले से ही मौजूद थे।
दोनों देशों ने 2030 तक आपसी व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य दोहराया, लेकिन यह लक्ष्य जितना सुनने में अच्छा लगता है, उतना ही मुश्किल भी है। क्योंकि आज की हकीकत इस लक्ष्य से काफी दूर है।
असल समस्या: व्यापार घाटा
भारत और रूस के बीच सबसे बड़ी समस्या व्यापार में भारी असंतुलन है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, भारत रूस से करीब 64 अरब डॉलर का सामान खरीदता है, जबकि रूस को भारत का निर्यात सिर्फ 5 अरब डॉलर के आसपास है। यानी भारत को रूस के साथ लगभग 60 अरब डॉलर का व्यापार घाटा है। खुद वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी माना है कि भारत का निर्यात बहुत कम है।
इसका मुख्य कारण यह है कि भारत रूस से ज़्यादातर कच्चा तेल और ऊर्जा उत्पाद खरीदता है, जबकि भारत की ओर से रूस को भेजा जाने वाला सामान सीमित है। मोबाइल, गाड़ियां, कपड़े, दवाइयां और उपभोक्ता सामान जैसे क्षेत्रों में संभावनाएं तो हैं, लेकिन ज़मीन पर इन्हें बढ़ाने की ठोस योजना अभी साफ नहीं दिखती।
आज की स्थिति यह है कि रूस के कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से भी कम है। ऐसे में 100 अरब डॉलर का लक्ष्य सिर्फ भाषणों से पूरा नहीं हो सकता।
ट्रंप का दबाव और भारत की रणनीति
इस मुलाक़ात को अमेरिका के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। ट्रंप ने भारतीय सामानों पर भारी टैरिफ लगाने की बात कही है। ऐसे में मोदी-पुतिन की नज़दीकी यह संकेत देती है कि भारत किसी एक देश के दबाव में नहीं आएगा। रूस से सस्ता तेल खरीदना भारत के लिए फायदेमंद भी रहा है।
लेकिन सच्चाई यह भी है कि रणनीतिक स्वतंत्रता दिखाना और आर्थिक मजबूती हासिल करना—दो अलग बातें हैं। बिना मजबूत निर्यात रणनीति के, सिर्फ तस्वीरों और बयानों से भारत की स्थिति मजबूत नहीं होगी।
रूस क्या चाहता है?
रूस की प्राथमिकता भी बहुत साफ है। वह चाहता है कि भारत उससे तेल खरीदता रहे, भुगतान डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं में हो और पश्चिमी प्रतिबंधों का असर कम पड़े। रूस BRICS मंच पर भी डॉलर से दूरी की बात करता है। लेकिन जब तक रूस अपने बाज़ार भारतीय उत्पादों के लिए पूरी तरह नहीं खोलता, तब तक भारत को असली फायदा नहीं मिलेगा।
अमेरिका बनाम रूस: फर्क साफ है
अगर भारत-अमेरिका व्यापार को देखें, तो तस्वीर बिल्कुल अलग है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच व्यापार 130 अरब डॉलर से ज्यादा का है और इसमें भारत को बड़ा फायदा होता है। भारत अमेरिका को आईटी सेवाएं, दवाइयां, हीरे, मशीनरी और कई तरह के उत्पाद बेचता है। यानी जहां बाज़ार खुला है, वहां भारत सफल है।
आगे का रास्ता
मोदी-पुतिन शिखर बैठक यह तो दिखाती है कि दोनों देशों के रिश्ते मजबूत हैं, लेकिन यह भी साफ करती है कि बड़े लक्ष्य तभी पूरे होंगे जब ठोस कदम उठाए जाएं। सिर्फ 100 अरब डॉलर कह देने से बात नहीं बनेगी। इसके लिए आसान नियम, बेहतर लॉजिस्टिक्स, कम टैरिफ और भारतीय कंपनियों के लिए असली बाज़ार चाहिए।
यह मुलाक़ात अमेरिका को संदेश देने और रूस को भरोसा दिलाने में तो सफल रही, लेकिन अब असली परीक्षा अर्थव्यवस्था के मैदान में है। जब तक भारत रूस के साथ अपने निर्यात को सच में नहीं बढ़ाता, तब तक ये बड़े सपने अख़बारों की सुर्खियों तक ही सीमित रहेंगे।
तस्वीरें सुर्खियां बनाती हैं, लेकिन रोज़गार और कमाई समझौतों से आती है। अब देखना यह है कि दोस्ती के ये वादे असली व्यापार में कब बदलते हैं।




