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मनरेगा पर वार या नाम बदलने की राजनीति? खड़गे बोले—यह ग़रीबों का हक़ छीनने की BJP-RSS साज़िश

महेंद्र कुमार । नई दिल्ली 16 दिसंबर 2025

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्र सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) का नाम बदलने और उसके स्वरूप में किए गए बदलावों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने साफ कहा कि यह सिर्फ नाम बदलने का मामला नहीं है, बल्कि MGNREGA को धीरे-धीरे खत्म करने की BJP-RSS की सोची-समझी साज़िश है। खड़गे ने आरोप लगाया कि संघ के सौ साल पूरे होने पर गांधी का नाम मिटाने की कोशिश यह दिखाती है कि जो लोग विदेशों में जाकर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देते हैं, उनकी सोच भीतर से कितनी खोखली और दिखावटी है।

खड़गे ने कहा कि जो सरकार गरीबों और मजदूरों के हक़ से चिढ़ती है, वही मनरेगा जैसी योजना पर हमला करती है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस अहंकारी सत्ता का कोई भी फैसला अगर गरीब और मजदूर विरोधी होगा, तो कांग्रेस पार्टी उसका संसद के अंदर और सड़क पर पुरज़ोर विरोध करेगी। कांग्रेस किसी भी कीमत पर करोड़ों गरीबों, मजदूरों और कामगारों के अधिकार सत्ता के हाथों छिनने नहीं देगी।

कांग्रेस ने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘महात्मा गांधी रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट’ का नाम बदलकर ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ रख दिया है। पार्टी ने इसे सिर्फ नाम बदलना नहीं, बल्कि गांधी के विचार और गरीबों के अधिकार पर सीधा हमला बताया। कांग्रेस नेताओं ने कड़े शब्दों में कहा कि जिन लोगों की विचारधारा से जुड़े व्यक्ति ने गांधी की हत्या की थी, वही आज उनके नाम को कानून से हटाने का पाप कर रहे हैं।

कांग्रेस का कहना है कि असल खतरा नाम बदलने से भी बड़ा है। पार्टी के अनुसार, मोदी सरकार ने काम के अधिकार की कानूनी गारंटी देने वाले कानून को बदलकर उसमें शर्तें जोड़ दी हैं और केंद्र का नियंत्रण बढ़ा दिया है, जो सीधे-सीधे राज्यों और मजदूरों—दोनों के खिलाफ है। वह मनरेगा, जो ग्रामीण भारत के लिए संजीवनी साबित हुई, जिसने गांव-देहात में करोड़ों लोगों को काम दिया और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संभाला—उसे अब कमजोर किया जा रहा है।

कांग्रेस ने बताया कि पहले MGNREGA एक ऐसी योजना थी, जिसमें अकुशल मजदूरों को काम मिलता था और पूरा बजट केंद्र सरकार देती थी। लेकिन अब नई व्यवस्था में 60 प्रतिशत खर्च केंद्र और 40 प्रतिशत खर्च राज्य सरकारों को उठाना पड़ेगा। कांग्रेस का आरोप है कि यह राज्यों के राजस्व पर सीधा हमला है और इसका इस्तेमाल केंद्र सरकार विपक्ष शासित राज्यों को दबाने के लिए कर सकती है। पार्टी ने तंज कसते हुए कहा कि “इस न्यू इंडिया में खर्च राज्य करेंगे और फोटो मोदी जी खिंचवाएंगे।”

पार्टी ने यह भी कहा कि MGNREGA पहले मांग पर आधारित योजना थी। यानी अगर कोई मजदूर काम मांगता था, तो सरकार को उसे काम देना और मजदूरी चुकानी होती थी। लेकिन नई स्कीम में यह अधिकार खत्म कर दिया गया है। अब काम केंद्र द्वारा तय किए गए मानकों और बजट के हिसाब से मिलेगा। अगर फंड खत्म हो गया, तो मजदूर का अधिकार भी खत्म। और अगर तय बजट से ज्यादा काम दिया गया, तो उसका भुगतान राज्य सरकारों को करना होगा। कांग्रेस के मुताबिक, इस तरह रोजगार की कानूनी गारंटी को एक प्रचार योजना में बदल दिया गया है, जिसमें खर्च राज्यों का होगा और नियंत्रण केंद्र का।

कांग्रेस ने ग्राम सभाओं और पंचायतों की भूमिका कमजोर किए जाने पर भी चिंता जताई है। पार्टी का कहना है कि मनरेगा के तहत काम स्थानीय ज़रूरतों के हिसाब से ग्राम सभाओं और पंचायतों के जरिए तय होता था, जिससे गांव का लोकतंत्र मजबूत होता था। लेकिन अब नई स्कीम में GIS टूल्स, PM गति शक्ति, डिजिटल प्लेटफॉर्म, बायोमेट्रिक्स, जियो-टैगिंग, डैशबोर्ड और AI ऑडिट जैसी शर्तें जोड़ दी गई हैं। कांग्रेस का आरोप है कि इससे तकनीक से दूर रहने वाले लाखों ग्रामीण मजदूर काम से बाहर हो जाएंगे।

इतना ही नहीं, कांग्रेस ने नई योजना में हर साल 60 दिन तक काम अनिवार्य रूप से निलंबित करने के प्रावधान पर भी सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि यह रोजगार की गारंटी नहीं, बल्कि मजदूरी पर नियंत्रण है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि इससे मजदूरों को मजबूरी में निजी खेतों में काम करने के लिए धकेला जाएगा, जो कल्याण नहीं बल्कि मजदूरों की सप्लाई करने जैसा है—जिसमें उनकी आय, इच्छा और सम्मान तीनों छीने जाते हैं।

कांग्रेस का साफ कहना है कि इस नई स्कीम का असली मतलब है—केंद्र सरकार का ज्यादा कंट्रोल, राज्यों को खर्च के लिए मजबूर करना और मजदूरों के अधिकारों पर शर्तें लगाना। पार्टी के मुताबिक, हर बार की तरह इस बार भी यह बदलाव गरीब-विरोधी है।

इस बीच कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा है कि पूरा विपक्ष यह मांग कर रहा है कि तीन अहम और दूरगामी असर वाले विधेयकों को संसद में जल्दबाज़ी से पास करने के बजाय संबंधित स्थायी समितियों के पास भेजा जाए, ताकि उन पर गहराई से अध्ययन और व्यापक चर्चा हो सके। उन्होंने कहा कि संसदीय परंपराओं के अनुसार सरकार को यह मांग माननी चाहिए।

जिन तीन विधेयकों को स्थायी समिति के पास भेजने की मांग की गई है, वे हैं—

1. उच्च शिक्षा आयोग विधेयक
2. परमाणु ऊर्जा विधेयक
3. G-RAM-G विधेयक

कांग्रेस और विपक्ष का कहना है कि ये कानून देश के भविष्य, राज्यों के अधिकार और आम लोगों की ज़िंदगी से सीधे जुड़े हैं, इसलिए इन्हें बिना पर्याप्त चर्चा के पारित करना लोकतंत्र के खिलाफ होगा।

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