साजिद अली । कोलकाता 14 दिसंबर 2025
पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत जारी की गई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने राज्य की राजनीति में जबरदस्त हलचल मचा दी है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में करीब 58 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए हैं, जो हाल के वर्षों में किसी भी राज्य में हुई सबसे बड़ी कटौती मानी जा रही है। तुलना करें तो यह संख्या बिहार में हुए SIR से भी अधिक बताई जा रही है। इस पूरे घटनाक्रम को और संवेदनशील बनाता है यह तथ्य कि सबसे अधिक नाम कटने वाले टॉप-5 विधानसभा क्षेत्रों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भवानीपुर सीट भी शामिल है। इससे न सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं, बल्कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सामने राजनीतिक तौर पर नई चुनौतियां खड़ी होती दिख रही हैं।
चुनाव आयोग के मुताबिक, SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध, अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना है। इसके तहत डुप्लीकेट नाम, मृत मतदाता, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके वोटर्स और अपात्र मतदाताओं की पहचान कर उनके नाम हटाए गए हैं। आयोग का दावा है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के तहत और निष्पक्ष तरीके से की गई है। हालांकि, एक साथ 58 लाख नामों का ड्राफ्ट से बाहर होना असाधारण माना जा रहा है। यही वजह है कि विपक्ष इसे सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक गंभीर राजनीतिक मुद्दा बता रहा है।
सबसे ज्यादा राजनीतिक ताप तब बढ़ा जब यह सामने आया कि भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र, जो ममता बनर्जी का राजनीतिक गढ़ माना जाता है, वह भी सबसे ज्यादा कटौती वाले इलाकों में शामिल है। भवानीपुर जैसे शहरी, शिक्षित और हाई-प्रोफाइल क्षेत्र में बड़ी संख्या में वोटरों के नाम हटना कई सवाल खड़े करता है। विपक्षी दलों का आरोप है कि इससे आगामी चुनावों में वोटिंग पैटर्न प्रभावित हो सकता है, खासकर उन सीटों पर जहां जीत-हार का अंतर कम रहता है। उनका कहना है कि इस तरह की कटौती से चुनावी संतुलन बदलने का खतरा पैदा होता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया का असर सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बंगाल की चुनावी राजनीति पर गहरा प्रभाव डालेगा। बीजेपी और वाम दलों ने पहले ही आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि जिन इलाकों में परंपरागत रूप से TMC का मजबूत आधार रहा है, वहां बड़ी संख्या में नाम हटने से वोट बैंक में सेंध लग सकती है। दूसरी ओर, TMC का तर्क है कि यह सिर्फ ड्राफ्ट लिस्ट है, अंतिम सूची नहीं। पार्टी का कहना है कि आपत्ति और सुधार की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम दोबारा जोड़े जाएंगे और घबराने की कोई जरूरत नहीं है।
इस पूरे विवाद में बिहार का उदाहरण भी बार-बार सामने लाया जा रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले हुए SIR में भी बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट की सफाई की गई थी। वहां ड्राफ्ट स्टेज में करीब 65 से 68 लाख नाम हटाए गए थे, लेकिन आपत्तियों और सुधार के बाद फाइनल रोल में नेट कटौती लगभग 44–50 लाख के बीच रही। इस दौरान करीब 21–24 लाख नए नाम जोड़े भी गए थे। बिहार में कुल मतदाता संख्या जनवरी 2025 में लगभग 7.8–7.9 करोड़ से घटकर फाइनल में करीब 7.42 करोड़ रह गई थी। विपक्षी दलों—कांग्रेस और RJD—ने आरोप लगाया था कि SIR के जरिए उनके समर्थक वर्गों, खासकर मुस्लिम और दलित वोटरों के नाम काटे गए, जिससे NDA को फायदा हुआ। वहीं चुनाव आयोग और NDA ने इसे महज सूची की सफाई बताया और कहा कि इसका चुनाव परिणामों पर निर्णायक असर नहीं पड़ा।
बंगाल में भी विपक्ष इसी तर्ज पर आशंका जता रहा है कि 58 लाख नामों की यह कटौती राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है। चुनाव आयोग ने हालांकि साफ किया है कि यह केवल ड्राफ्ट वोटर लिस्ट है और हर नागरिक को दावा-आपत्ति दर्ज कराने का पूरा मौका मिलेगा। जरूरी दस्तावेज दिखाकर नाम दोबारा जुड़वाए जा सकते हैं। इसके बावजूद, विपक्ष इसे “लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला” बताते हुए सड़क से सदन तक उठाने की तैयारी में है।
कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल में SIR ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने यह साफ कर दिया है कि मतदाता सूची महज एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि सीधी राजनीतिक लड़ाई का मैदान बन चुकी है। आने वाले दिनों में जब आपत्तियों और सुधार की प्रक्रिया पूरी होगी, तब यह स्पष्ट होगा कि कितने नाम वापस जोड़े जाते हैं और कितनी कटौती बरकरार रहती है। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि 58 लाख नामों की यह ‘कैंची’ बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक चर्चा का केंद्र बनी रहेगी—और यह सवाल लगातार उठता रहेगा कि क्या इससे ममता बनर्जी और TMC की चुनावी मुश्किलें वाकई बढ़ेंगी, या यह भी बिहार की तरह अंततः एक प्रशासनिक प्रक्रिया बनकर रह जाएगी।




