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सिमटता जापान: एक साल में 9 लाख लोग कम, अर्थव्यवस्था और समाज पर खतरे की घंटी

अंतरराष्ट्रीय डेस्क 13 दिसंबर 2025

टोक्यो/नई दिल्ली। जापान की जनसंख्या संकट गहराता जा रहा है, जहां पिछले एक वर्ष में देश की कुल आबादी में लगभग 9 लाख से अधिक लोगों की कमी दर्ज की गई है, जो आंकड़ों के अनुसार 1968 के बाद से सबसे बड़ी गिरावट है। देश के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2024 में जापानी नागरिकों की संख्या करीब 908,574 कम हो गई, जो कि कुल आबादी का लगभग 0.7 प्रतिशत गिरावट दर्शाती है। यह लगातार 16 वां वर्ष है जब जापान की आबादी लगातार घट रही है, और विशेषज्ञ इसे ‘शांत आपातकाल’ जैसी स्थिति बता रहे हैं।

जापान की इस गिरावट का मुख्य कारण निम्न जन्म दर और अत्यधिक वृद्ध होती आबादी है। देश में जन्म दर पिछले रिकॉर्ड में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है, जहां साल 2024 में मात्र लगभग 6,86,061 बच्चे ही पैदा हुए, जो 1899 के बाद से अब तक का सबसे कम आंकड़ा है। वहीँ, मौतों की संख्या में वृद्धि और बढ़ती उम्र के कारण मौतें नए जन्मों से कहीं अधिक हुईं, जिससे कुल जनसंख्या में भारी गिरावट आई।

देश के अधिकांश हिस्सों में युवा आबादी लगातार कम हो रही है, जबकि बुजुर्गों का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। लगभग तीस प्रतिशत आबादी अब 65 वर्ष से ऊपर हो चुकी है, जो जापान को दुनिया के सबसे वृद्ध राष्ट्रों में से एक बनाती है। आर्थिक और सामाजिक विश्लेषकों के मुताबिक, यही वृद्धावस्था की बढ़ती दर और जन्म दर की गिरावट जापान के सामने सबसे गंभीर डेमोग्राफिक समस्या बन गई है।

जनसंख्या में इस तरह की गिरावट का असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी स्पष्ट रूप से दिख रहा है। युवा और कामकाजी वर्ग के घटने से आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ रही है, वहीं सरकार पर बुजुर्गों को पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा देने का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जापान जल्द ही प्रभावी समाधान नहीं ढूंढता, तो यह कठिनाइयाँ आने वाले वर्षों में और गंभीर रूप ले सकती हैं।

सरकार ने हाल के वर्षों में जन्म दर बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए हैं, जैसे कि बच्चों की परवरिश और परिवार को समर्थन देने वाली योजनाएं, कार्य-जीवन संतुलन सुधारने की पहलें, और महिलाओं तथा युवा परिवारों के लिए प्रोत्साहन प्रदान करना। इसके बावजूद इन नीतियों का अब तक कहीं भी व्यापक असर दिखाई नहीं दे रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या का समाधान आसानी से नहीं होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि जापान को समग्र नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है, जिसमें सामाजिक संरचना, शिक्षा, श्रम बाजार और पारिवारिक नीतियों में बड़े पैमाने पर बदलाव शामिल हों। इसके बिना जापान का यह जनसंख्या संकट सिर्फ संख्यात्मक गिरावट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मोर्चों पर भी सबसे बड़ा संकट बन जाएगा, जो देश के भविष्य को गहराई से प्रभावित कर सकता है।

इस गिरावट के बीच, कुछ क्षेत्रों में विदेशी निवासियों की संख्या बढ़ी है, जिससे कुछ हद तक कार्यबल की कमी को भरने की कोशिश की जा रही है। फिर भी, यह बदलाव पर्याप्त नहीं है, क्योंकि जापान की मूल आबादी की गिरावट की दर इतना तेज़ है कि सिर्फ आप्रवास ही समस्या का दीर्घकालिक समाधान नहीं बन पा रहा है।

जापान के लिए यह कोई छोटी भूतपूर्व घटना नहीं है, बल्कि यह एक दीर्घकालिक जनसंख्या आपातकाल जैसा संकट बन चुका है, जिसका असर आने वाले दशक भर में देश की दिशा और दशा दोनों पर बेहद गहरा प्रभाव डालेगा।

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