एबीसी डेस्क 11 दिसंबर 2025
संसद के मानसून सत्र में एक अनोखा और ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला, जब वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के क्लासिक उपन्यास ‘आनंद मठ’ की खुलकर प्रशंसा की। सिब्बल ने न केवल इस उपन्यास की साहित्यिक महत्ता को रेखांकित किया, बल्कि यह भी बताया कि आखिर बंकिम चंद्र ने यह रचना क्यों लिखी, किस दौर में लिखी और इसका भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर क्या गहरा प्रभाव पड़ा। उनका भाषण सुनकर पूरा सदन इतिहास और राष्ट्रीय चेतना से भर गया, क्योंकि ‘आनंद मठ’ कोई साधारण उपन्यास नहीं है बल्कि वह कृति है जिसने भारतीयों के दिल में स्वतंत्रता की आग जगाई और “वंदेमातरम्” जैसे अमर राष्ट्रगीत को जन्म दिया।
कपिल सिब्बल ने बताया कि ‘आनंद मठ’ का जन्म 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 19वीं शताब्दी की शुरुआत के भयावह दौर में हुआ, जब बंगाल भयंकर अकाल, सामाजिक अराजकता और ब्रिटिश साम्राज्य के कठोर शासन से जूझ रहा था। 1770 का “ग्रेट बंगाल फेमिन” (महाअकाल) लाखों लोगों की जान लील गया था और लोगों के भीतर गुस्सा, निराशा और विद्रोह पनपने लगा था। इस पृष्ठभूमि में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने एक ऐसा उपन्यास रचा जिसने लोगों को यह एहसास दिलाया कि गुलामी कोई भाग्य नहीं, बल्कि उससे लड़ना ही कर्तव्य है। सिब्बल ने कहा कि बंकिम चंद्र किसी राजनीतिक मंच के नेता नहीं थे, लेकिन उनके शब्दों ने लाखों भारतीयों को मानसिक और भावनात्मक रूप से आज़ादी के संघर्ष के लिए तैयार कर दिया।
सिब्बल ने यह भी कहा कि ‘आनंद मठ’ लिखने का मकसद ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रत्यक्ष उकसावा नहीं था, बल्कि उसमें छिपी प्रतिरोध की प्रतीकात्मक भाषा ने जनता के मन में राष्ट्रीय चेतना को तीव्र कर दिया। उपन्यास में संन्यासियों को विद्रोहियों के रूप में दिखाया गया, जो देश की आजादी के लिए संगठित होकर लड़ते हैं। संन्यासियों का यह संघर्ष किसी एक समुदाय का संघर्ष नहीं था, बल्कि भारत माता की मुक्ति का सामूहिक आह्वान था। कपिल सिब्बल ने कहा कि साहित्य और कला का उद्देश्य कभी-कभी राजनीति से भी बड़ा होता है, क्योंकि वह जनता के मन में वह भावनात्मक बदलाव लाता है जिसे सत्ता की ताकत भी नहीं रोक सकती। ‘आनंद मठ’ इसका सबसे शानदार उदाहरण है।
उपन्यास में वर्णित “भारत माता” की अवधारणा ने भारतीय समाज को पहली बार यह परिचित कराया कि देश सिर्फ एक भौगोलिक भूभाग नहीं, बल्कि एक जीवित शक्ति है—एक मां, जिसके लिए संघर्ष करना धर्म है। बंकिम चंद्र ने इस उपन्यास में मातृभूमि को दो रूपों में दिखाया—एक बिखरी, घायल, भूखी मां, और दूसरी भविष्य की उज्ज्वल, संपन्न, सुन्दर मां। यह प्रतीकवाद लोगों के हृदय में गहराई से उतरा और देशभक्ति की भावना को नई दिशा मिली। यही कारण है कि आगे चलकर यह उपन्यास स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया। भगत सिंह, अरविंद घोष, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, लाला लाजपत राय जैसे महान क्रांतिकारी ‘आनंद मठ’ और “वंदे मातरम्” से ऊर्जा प्राप्त करते रहे।
कपिल सिब्बल ने अपने भाषण में यह भी याद दिलाया कि ‘आनंद मठ’ का प्रभाव केवल साहित्य तक सीमित नहीं रहा। इस उपन्यास के माध्यम से बंकिम चंद्र ने सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय एकता और आंतरिक शक्ति के विचारों को भी मजबूत किया। उपन्यास की प्रसिद्ध पंक्तियाँ और संवाद आत्मबल, साहस और राष्ट्र-समर्पण के प्रतीक बन गए। इसके नायकों ने जनता को यह संदेश दिया कि विदेशी शासन से मुक्ति तभी मिलेगी जब समाज भय छोड़कर एकजुट होगा और अपनी खोई हुई शक्ति को पहचानेगा। सिब्बल का कहना था कि आज जब देश कई सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों से गुजर रहा है, तब ‘आनंद मठ’ की यह सीख पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है।
अंत में कपिल सिब्बल ने कहा कि ‘आनंद मठ’ केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वैचारिक नींव है। इसने भारतीयों के मन में राष्ट्रवाद की वह लौ जलाई जो 1857 के विद्रोह से लेकर 1947 की आज़ादी तक लगातार प्रज्वलित रही। “वंदे मातरम्” इसी उपन्यास की देन है और आज भी भारत के हर नागरिक के दिल में एक पवित्र स्थान रखता है। साहित्य की यही शक्ति है कि वह समय, राजनीति और पीढ़ियों से परे जाकर समाज की आत्मा को छू लेता है। संसद में सिब्बल का भाषण यह याद दिलाने वाला था कि भारत की आज़ादी सिर्फ हथियारों की लड़ाई नहीं, बल्कि विचारों की भी क्रांति थी—और ‘आनंद मठ’ उस क्रांति का सबसे प्रभावी हथियार।




