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देश में 140 करोड़ लोगों की नागरिकता पर संदेह?—सुप्रीम कोर्ट में SIR पर सवाल, चुनाव आयोग की ‘नागरिकता पुलिस’ बन जाने पर कड़ी फटकार

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आलोक कुमार । नई दिल्ली 9 दिसंबर 2025

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार का दिन भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐतिहासिक, चिंता भरा और कई मायनों में निर्णायक साबित हुआ। चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई Special Intensive Revision (SIR)—मतदाता सूची की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया—को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान अदालत में ऐसी दलीलें पेश हुईं जिन्होंने पूरे देश को चौंका दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह कहा गया कि यह प्रक्रिया केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि पूरे भारत के 140 करोड़ लोगों पर नागरिकता का बोझ थोप देने जैसा अभूतपूर्व कदम है। अदालत में बार-बार यह सवाल उठा कि क्या केवल मतदाता सूची शुद्ध करने के नाम पर आज़ाद भारत के हर नागरिक को अपनी ही नागरिकता पर सबूत देने के लिए मजबूर किया जा सकता है?

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील निज़ाम पशा ने अदालत में बेहद तीखी दलील देते हुए कहा कि SIR एक तरह से ऐसा देशव्यापी अभियान बन गया है जिसमें “हर भारतीय को नागरिकता साबित करनी पड़ेगी”। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के लाल बाबू हुसैन फैसले का हवाला दिया जिसमें साफ कहा गया था कि नए मतदाता को ही अपनी नागरिकता का स्वयं-घोषणापत्र देना होता है, लेकिन किसी भी मौजूदा मतदाता को ‘विदेशी’ मानने का बोझ सरकार या शिकायतकर्ता पर होता है। पशा ने कहा कि EC ने इस सिद्धांत को उलट दिया है—और अब नागरिक को ही खुद को नागरिक साबित करना पड़ रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि चुनाव आयोग ने एक मात्र एक्ज़ीक्यूटिव नोटिफिकेशन के जरिए खुद को केंद्र सरकार के समानांतर ‘नागरिकता जांच प्राधिकारी’ बना लिया है, जबकि न तो संविधान और न ही कोई कानून उसे ऐसी छानबीन का अधिकार देता है।

वहीं शाहरुख आलम ने इस पूरे विवाद को एक और गहराई देते हुए कहा कि “गैर-कानूनी प्रवासी” कोई सामाजिक पहचान नहीं है, बल्कि यह एक क़ानूनी निष्कर्ष है जिसे केवल न्यायाधिकरण ही प्रमाणित कर सकते हैं। उन्होंने सवाल उठाया—जब SIR नोटिफिकेशन में नागरिकता-जांच का उद्देश्य लिखा ही नहीं, तब चुनाव आयोग को यह अधिकार प्राप्त ही कैसे हुआ कि वे करोड़ों नागरिकों की नागरिकता का “न्यायिक” परीक्षण करें? उन्होंने चेताया कि यह खोजपूर्ण (inquisitorial) प्रक्रिया न केवल कानून के दायरे से बाहर है बल्कि लाखों लोगों को ‘स्टेटलेस’ बनाने का खतरा भी उत्पन्न करती है।

हियरिंग के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांतों सेन ने तर्क रखा कि चुनाव आयोग द्वारा जारी SIR को कानून या नियम के बराबर नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि Representation of the People Act (ROPA), 1950 की धारा 21(3) ही मतदाता सूची के पुनरीक्षण का पूरा ढांचा तय करती है। जब यह कानून मौजूद है, तो EC सीधे Article 324 का सहारा लेकर अपनी शक्तियों का विस्तार नहीं कर सकता। सेन ने दो टूक कहा—“EC जो हासिल करना चाहता है, SIR की प्रक्रिया उसके बिल्कुल विपरीत दिशा में काम कर रही है।” मतलब, यह पुनरीक्षण नहीं बल्कि जन-जांच अभियान बन गया है जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है।

इस बीच वरिष्ठ अधिवक्ता शदान फरासत ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग के पास “नागरिकता जांच” की कोई निहित या स्पष्ट शक्ति नहीं है। नागरिकता की जांच का अधिकार केवल विदेशी न्यायाधिकरणों और केंद्र सरकार के पास है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा वोटर को नागरिक मानने की कानूनी प्रेज़म्पशन को हटाना किसी भी संस्था के अधिकार क्षेत्र में नहीं, और न ही मात्र फॉर्म भरवाने या दस्तावेज़ मांगने से किसी की नागरिकता पर संदेह किया जा सकता है। उनका यह तर्क खासतौर पर महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसी सिद्धांत पर भारत की पूरी मतदाता व्यवस्था अब तक टिके रही है—कि जो पहले से वोटर है, उसे ‘गैर-नागरिक’ मानने का प्रमाण सरकारी संस्था को देना होता है, नागरिक को नहीं।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग लगातार यह दावा करता रहा कि उसकी plenary powers—जो Article 324 के तहत आती हैं—उसे नागरिकता सत्यापन सहित किसी भी प्रक्रिया को चुनाव की शुचिता के लिए अपनाने की अनुमति देती हैं। लेकिन अदालत में आज इस दावे को गंभीर चुनौती मिली। न्यायमूर्ति सत्यज्ञान बागची ने तीखे स्वर में सवाल पूछा—“क्या चुनाव आयोग नागरिकता निर्धारित करने के लिए इनक्विज़िटोरियल शक्ति अपना सकता है? क्या उसका अधिकार सिर्फ उम्र और निवास की जांच तक सीमित नहीं है?” यह सवाल खुद बताता है कि सर्वोच्च न्यायालय भी SIR की सीमा और EC के अधिकार क्षेत्र पर गंभीर रूप से चिंतित है।

सुनवाई के दौरान दूसरी घटनाओं ने भी SIR की जमीनी हकीकत को उजागर किया। पश्चिम बंगाल में BLOs पर हमले, गाली-गलौज, गेराओ और कार्यभार बढ़ने की शिकायतें अदालत में सामने आईं। कई राज्यों ने कर्मचारियों की कमी और तनाव का हवाला देते हुए मदद मांगी। न्यायालय ने साफ कहा कि राज्य सरकारें BLOs की नियुक्ति और उनकी सहायता सुनिश्चित करें—क्योंकि यह प्रक्रिया अब पूरे देश में “टाइटली-वाउंड” यानी समय-सीमा से बंधी हुई है।

सुप्रीम कोर्ट ने आज उन याचिकाओं पर भी प्रतिक्रिया मांगी जो दावा करती हैं कि SIR से CAA 2019 के तहत नागरिकता की प्रतीक्षा कर रहे पश्चिम बंगाल के हिंदू, बौद्ध, जैन, ईसाई शरणार्थियों में गहरा भय फैल गया है। याचिकाकर्ता NGO ‘आत्मदीप’ का कहना है कि ये समुदाय पहले ही नागरिकता प्रमाणपत्र का इंतज़ार कर रहे हैं, और अब SIR में दोबारा दस्तावेज़ और नागरिकता प्रमाण देने की मांग ने उनकी स्थिति को और अनिश्चित बना दिया है।

आज की सुनवाई ने एक बात स्पष्ट कर दी—SIR केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत की नागरिकता, मताधिकार और लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे से जुड़ा हुआ प्रश्न बन चुका है। क्या EC मतदाता सूची की शुचिता के नाम पर नागरिकता का न्यायिक परीक्षण कर सकता है? क्या पूरी आबादी से दस्तावेज़ मांगना लोकतंत्र को सुरक्षित करेगा या लाखों लोगों को अधिकार छीने जाने की कगार पर धकेल देगा? क्या संवैधानिक संस्थाओं की शक्ति सीमाओं का सम्मान किया जाएगा या “प्लेनरी पॉवर्स” के नाम पर असीम अधिकारों की ओर बढ़ा जाएगा?

इन सवालों का जवाब सिर्फ अदालत के फैसले में नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र के भविष्य में तय होगा—क्योंकि आज की बहस मतदाता सूची की नहीं, बल्कि हम सभी की नागरिकता की बहस बन चुकी है।

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