अंतरराष्ट्रीय डेस्क 7 दिसंबर 2025
ईरान में एक मैराथन दौड़ ने ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया है, जिसकी गूंज अब देश के राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक हलकों में सुनाई दे रही है। 5 दिसंबर को आयोजित इस मैराथन में कई महिलाएँ बिना हिजाब के भाग लेती दिखाई दीं। जैसे ही इनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर सामने आईं, कट्टरपंथी समुदाय और रूढ़िवादी मीडिया ने इसे इस्लामिक कानूनों का खुला उल्लंघन बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई। ईरान में सालों से लागू सख्त हिजाब कानून के चलते इस घटना को गंभीर अपराध की तरह देखा गया और इसके बाद से पूरे मामले में प्रशासनिक कार्रवाई शुरू हो गई।
रूढ़िवादी अखबारों ने इसे धार्मिक मूल्यों पर हमला बताया और न्यायपालिका से कड़ी कार्रवाई की मांग की। मांग के दबाव और बढ़ते विवाद के बीच ईरानी अधिकारियों ने कदम उठाते हुए मैराथन के दो प्रमुख आयोजकों को गिरफ्तार कर लिया। न्यायपालिका ने अपने बयान में कहा कि कार्यक्रम के आयोजकों को पहले भी नियमों और सांस्कृतिक सिद्धांतों का पालन करने की चेतावनी दी गई थी, लेकिन फिर भी उन्होंने ऐसी प्रतियोगिता आयोजित की, जिससे सार्वजनिक शिष्टाचार का उल्लंघन हुआ। अधिकारियों का कहना है कि आयोजन समिति ने धार्मिक, सांस्कृतिक और कानूनी मानदंडों की अनदेखी की और अब उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया है।
ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब पहनना 1980 के दशक से कानूनी रूप से अनिवार्य है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में खासकर महसा अमीनी की 2022 में पुलिस हिरासत में मौत के बाद हिजाब कानूनों के खिलाफ बड़े पैमाने पर जन आंदोलन खड़ा हो गया था। हजारों महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर हिजाब जलाने के प्रतीकात्मक विरोध से लेकर खुले तौर पर सिर न ढकने तक का कदम उठाया था। तब से ईरान में यह मुद्दा सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई बन चुका है, जिसमें महिलाएँ लगातार परंपरागत नियमों को चुनौती दे रही हैं।
इस मैराथन की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बहस फिर तेज़ हो गई है। एक तरफ कट्टरपंथी इसे पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बताते हुए इस्लामिक कानूनों के लिए खतरा मानते हैं, वहीं दूसरी ओर कई युवा, महिलाएँ और मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे मूलभूत स्वतंत्रता का सवाल बता रहे हैं। उनका कहना है कि महिलाओं को खेल, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में समान और स्वैच्छिक भागीदारी का अधिकार है, और हिजाब पहनना व्यक्तिगत विकल्प होना चाहिए, न कि दंडात्मक कानून की शर्त।
ईरान की न्यायपालिका और सुरक्षा एजेंसियों पर पहले भी हिजाब कानून लागू करने में सख्ती दिखाने के आरोप लगते रहे हैं। पिछले वर्ष सरकार ने हिजाब के उल्लंघन पर भारी जुर्माने और लंबी जेल सज़ा वाले कठोर कानून पास किए थे, लेकिन देश में संभावित बड़े पैमाने पर विरोध देखते हुए सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने उसे लागू करने पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद व्यवस्था पर यह दबाव लगातार बना रहता है कि हिजाब अनिवार्य कानून का पालन कड़ाई से करवाया जाए।
इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि ईरान में हिजाब का मुद्दा अब सिर्फ धार्मिक कानून का पालन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, पहचान, महिलाओं के अधिकार और राज्य सत्ता के बीच संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। मैराथन में बिना हिजाब दौड़ती इन महिलाओं की तस्वीरें एक बार फिर यह याद दिलाती हैं कि ईरान में दो विचारधाराएँ आमने–सामने खड़ी हैं—एक जो परंपराओं को सख्ती से लागू करना चाहती है, और दूसरी जो व्यक्तिगत आज़ादी की राह पर आगे बढ़ रही है। दौड़ खत्म हो चुकी है, लेकिन समाज और सत्ता के बीच यह संघर्ष फिलहाल रुकने वाला नहीं दिखता।




