प्रमोद कुमार । पंजी 7 दिसंबर 2025
गोवा के अरपोरा क्षेत्र में स्थित Birch by Romeo Lane नाइटक्लब में आधी रात के बाद लगी भीषण आग ने 25 परिवारों को हमेशा के लिए शोक में डूबा दिया। रविवार तड़के हुई इस घटना ने न सिर्फ गोवा की रातों को जगमगाने वाली मनोरंजन संस्कृति पर सवाल उठाए हैं, बल्कि सिस्टम, प्रशासन, सेफ़्टी नियमों और प्रवर्तन एजेंसियों की कार्यशैली पर भी गंभीर संदेह खड़ा कर दिया है। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो लगभग 100 लोग क्लब के डांस फ्लोर पर थे, तभी आग भड़क उठी और अफरा-तफरी में कई लोग नीचे बेसमेंट की तरफ भागे, जहां घुटन और धुएं में फँसकर उनकी मौत हो गई। पुलिस का शुरुआती बयान था कि सिलेंडर ब्लास्ट से आग लगी, जबकि कई गवाहों का दावा है कि लपटें ऊपर पहली मंज़िल से उठती दिखाई दी थीं।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि यह पूरा क्लब एक ऐसे भवन में चल रहा था जिसे निर्माण लाइसेंस ही उपलब्ध नहीं था। अरपोरा पंचायत के सरपंच रोशन रेडकर ने साफ़ तौर पर बताया कि इमारत बिना वैध अनुमति के बनाई गई थी और पंयचत की ओर से विधिवत जांच के बाद डिमॉलिशन नोटिस भी जारी कर दिया गया था। लेकिन मालिकों ने अपील कर इस आदेश पर ‘स्टे’ ले लिया—और इसी कानूनी ठहराव का फायदा उठाते हुए क्लब रात-दिन चल रहा था। सरपंच के अनुसार क्लब संचालक सौरभ लूथरा के खिलाफ ज़मीन मालिकों और कारोबारी साझेदारों की शिकायतें पहले से लंबित थीं। सवाल यह है कि जब एक अवैध निर्माण पर पंचायत ने खुद कार्रवाई तय पाई थी, तो उच्च प्रशासनिक स्तर पर इस क्लब को चलने की अनुमति कैसे मिली। यह पूरा घटनाक्रम गोवा पंचायत राज एक्ट के प्रावधानों और इसके क्रियान्वयन पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह छोड़ता है।
घटना के बाद राज्य प्रशासन और केंद्र के शीर्ष नेतृत्व की प्रतिक्रियाएँ भी आनी शुरू हो गईं। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी—सभी ने गहरी संवेदनाएँ व्यक्त कीं और पीड़ित परिवारों के प्रति सहानुभूति जताई। पीएम ने मृतकों के परिजनों को PMNRF से 2 लाख और घायलों को 50 हजार रुपये की सहायता की घोषणा की। लेकिन राजनीतिक नेतृत्व के वक्तव्यों और संवेदनाओं के बावजूद, देशभर में वही पुराना सवाल गूंजता रहा—क्या सिर्फ मुआवज़ा और दुख प्रकट कर देने से ऐसी त्रासदियाँ रुकती हैं?
खड़गे ने प्रशासनिक विफलता का मुद्दा उठाते हुए कहा कि यह “टाला जा सकने वाला हादसा” था और इसकी व्यापक जांच तथा कड़ी जवाबदेही तय होनी चाहिए। भाजपा विधायक माइकल लोबो ने भी कहा कि गोवा के सभी क्लबों का सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य किया जाए, क्योंकि पर्यटन राज्य की छवि, कामगारों की सुरक्षा और यात्रियों का विश्वास—तीनों दांव पर लगे हुए हैं। कई मृतक कर्मचारी थे, तीन महिलाएँ भी शामिल थीं। पर्यटन राज्य में क्लब संस्कृति के विस्तार के बीच सेफ्टी मानकों की अनदेखी एक खतरनाक पैटर्न बन चुकी है।
मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने घटनास्थल का दौरा करने के बाद माना कि क्लब ने अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया था और तत्काल मजिस्ट्रियल जांच के आदेश जारी किए। उन्होंने यह भी बताया कि क्लब के मालिक और जनरल मैनेजर के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई है और गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाएगी। लेकिन सवाल सिर्फ एक रात के प्रबंधन का नहीं है—अगर बिल्डिंग अवैध थी, फायर NOC गायब थी, शिकायतें लंबित थीं, और सेफ़्टी ऑडिट नहीं हुआ था, तो किसी एक स्तर की नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की परत-दर-परत विफलता सामने आती है।
प्रत्यक्षदर्शियों के बयान घटनास्थल की भयावहता को और स्पष्ट करते हैं। हैदराबाद की पर्यटक फ़ातिमा शेख ने बताया कि जब लोग भागे तो नीचे की ओर जाते ही घना धुआँ और अँधेरा फैल चुका था, जिसकी वजह से बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिल पाया। कई शव इसी घुटन की वजह से मिले। छह घायल अब भी अस्पताल में जिंदगी से जूझ रहे हैं। पुलिस अब आग लगने के मूल कारणों की जांच कर रही है। गोवा पुलिस और फायर डिपार्टमेंट साइंटिफिक रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आग शॉर्ट-सर्किट से लगी, सिलेंडर ब्लास्ट से या क्लब के अवैध ढांचे और खराब प्लानिंग के कारण फैल गई।
घटना के तुरंत बाद गोवा सरकार ने आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर जारी किए, जिसमें जिला कलेक्टर कार्यालय, पुलिस कंट्रोल रूम और बारदेज़-तिसवाड़ी क्षेत्रों के अधिकारियों को त्वरित सहायता के लिए नियुक्त किया गया। लेकिन यह प्रशासनिक व्यवस्था भी उस समय किसी काम की नहीं रही, जब मलबे से शव निकाले जा रहे थे और बेसमेंट में दर्जनों जिंदगियाँ बुझ चुकी थीं।
समाज, सरकार, न्याय प्रणाली और स्थानीय प्रशासन के बीच यह वास्तविकता बार-बार उजागर हो रही है कि भारत में दुर्घटना के बाद नियम याद आते हैं—पर उससे पहले नहीं। अवैध निर्माण, लाइसेंसिंग में लापरवाही, अग्नि सुरक्षा मानकों की अनदेखी, और विवादित क्लबों को चलने देने की अनुमति—यह सब मिलकर एक ऐसी त्रासदी का कारण बने जिसे न केवल रोका जा सकता था, बल्कि बार-बार चेतावनियाँ मिलने के बाद भी रोका नहीं गया। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि चेतावनी है कि पर्यटन और मनोरंजन के नाम पर सुरक्षा से समझौता जीवन और शासन—दोनों को ख़तरे की ओर ले जाता है।
गोवा की यह रात सिर्फ एक दुर्घटना का बयान नहीं, बल्कि सिस्टम की असफलताओं की वह काली परछाईं है जिसे नज़रअंदाज़ करना अब असंभव है। शिकायतों पर कार्रवाई, लाइसेंस जांच, सेफ़्टी ऑडिट, अग्नि सुरक्षा मानकों का कड़ाई से पालन—इन सभी में वास्तविक सुधार किए बिना ऐसी त्रासदियों पर विराम नहीं लगाया जा सकता। मरने वाले 25 लोग सिर्फ आँकड़ा नहीं, चेतावनी हैं कि लापरवाही की कीमत कितनी भारी हो सकती है।




