आलोक कुमार । नई दिल्ली 6 दिसंबर 2025
देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो के खिलाफ उठ रहे सवाल अब केवल उड़ान रद्द होने तक सीमित नहीं रहे, बल्कि यह भारत में बढ़ते आर्थिक केंद्रीकरण, कॉरपोरेट दबदबे और सरकारी नीतियों की कमजोर पड़ती विश्वसनीयता का प्रतीक बन गए हैं। पायलट एसोसिएशन की आधिकारिक आपत्तियों से लेकर विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाओं तक—हर तरफ़ से एक ही निष्कर्ष निकलकर आ रहा है कि सरकार चाहे जितनी शक्तिशाली एजेंसियों की मालिक हो, इंडिगो जैसी कंपनियों के सामने वह भी अक्सर झुकती दिखाई देती है। जब एक एयरलाइन अपनी मनमानी से हज़ारों यात्रियों को परेशान कर सकती है, पायलटों को थकान की हद तक धकेल सकती है, और फिर भी नियामक संस्था DGCA उसे राहत दे दे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि देश किस तरह की आर्थिक संरचना की ओर बढ़ रहा है।
इंडिगो के पायलटों की कमी और थकान को लेकर सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु FDTL (Flight Duty Time Limitations) के नए नियम लागू किए गए थे। लेकिन पायलटों के संघ ALPA के अनुसार, DGCA ने इन नियमों में ढील देकर केवल इंडिगो को विशेष छूट दे दी। ALPA के पत्र के मुताबिक, दो वर्षों की तैयारी के बावजूद इंडिगो अपने स्टाफ को व्यवस्थित करने में विफल रहा और अब वही कंपनी दबाव डालकर राहत चाह रही है। पायलट संघ ने इसे “मानव जीवन की सुरक्षा के साथ खिलवाड़” बताया है और कहा है कि ऐसी selective relaxation न केवल खतरनाक है, बल्कि यह एक खतरनाक मिसाल भी स्थापित करती है—वही मॉडल जिसे दुनिया भर में ‘Too Big to Discipline’ कहा जाता है, जहाँ शक्तिशाली कंपनियाँ सरकारों को भी चुनौती देने लगती हैं।
यात्रियों के लिए यह संकट किसी दुःस्वप्न से कम नहीं रहा। देशभर से मिलने वाली शिकायतें बताती हैं कि लोग घंटों फँसे रहे, उनके पैसे और भरोसे दोनों की हानि हुई, और उनके जरूरी काम—व्यापार से लेकर इलाज तक—सब दूभर हो गए। दूसरी तरफ, कॉरपोरेट घरानों की बिजली कंपनियाँ अगर शुल्क बढ़ाने की धमकी दें, तो सरकार तत्काल उनकी मांगें मान लेती है। यह तुलना साफ दिखाती है कि जनता की असुविधा और कॉरपोरेट हितों में किसे प्राथमिकता मिल रही है।
इंडिगो संकट ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या भारत किसी ‘गोल्डन एज’ में है या ‘कैपिटलिस्ट डिके’ में, जहाँ लालच से संचालित आर्थिक ढाँचे समाज को भीतर ही भीतर खोखला कर रहे हैं? एयरलाइन सेक्टर में इंडिगो–विस्तारा डुओपोली और अन्य क्षेत्रों में बढ़ती आर्थिक एकाग्रता इस बात का संकेत हैं कि बाज़ार कुछ चुनिंदा कंपनियों के नियंत्रण में सिमटता जा रहा है। और जब उद्योगपति राजनीति और नीतियों को प्रभावित करने लगें, तब जनता हमेशा कीमत चुकाती है।
ALPA ने यह भी आरोप लगाया है कि इंडिगो ने नए नियम लागू होने से पहले जानबूझकर अपने संचालन बढ़ाए, जिससे कृत्रिम संकट पैदा हुआ। फिर इसी संकट का हवाला देकर उसने राहत की मांग की—यानी पहले समस्या पैदा करो, फिर ‘पब्लिक इनकन्वीनियंस’ का हवाला देकर सरकार को झुकाओ। यह रणनीति भारत के कई सेक्टरों में सामान्य होती जा रही है और अब इसका असर हवाई सुरक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र पर भी दिखने लगा है।
समस्या केवल इंडिगो की मनमानी नहीं है; यह भारत के कमजोर होते नियामक ढांचे, कॉरपोरेट–सरकार समीकरण और जनता के प्रति जवाबदेही घटती व्यवस्था का आईना है। हवाई यात्रा कभी सुविधा और प्रतिष्ठा का प्रतीक थी, लेकिन आज यात्री कहते हैं कि हालात बिहार जाने वाली भीड़भाड़ वाली ट्रेनों से भी बदतर हो चुके हैं। यदि आर्थिक केंद्रीकरण ऐसे ही बढ़ता रहा, तो भविष्य में देश को ऐसे ही कई ‘कृत्रिम संकटों’ का सामना करना पड़ेगा—जहाँ नुकसान जनता का होगा, राहत कॉरपोरेट्स को मिलेगी, और सिस्टम उनके आगे नतमस्तक रहेगा।





