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रुपया ऐतिहासिक दबाव में: डॉलर के सामने 90 और पौंड के मुकाबले 105 पार—अर्थव्यवस्था में हड़कंप, महंगाई का खतरा गहराया

सुनील सिंह । नई दिल्ली 3 दिसंबर 2025

भारतीय रुपया इस समय अभूतपूर्व गिरावट का सामना कर रहा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, लगातार बदलते भू-राजनीतिक हालात, विदेशी निवेश में कमी और घरेलू बाजार की कमजोर होती स्थितियों ने मिलकर रुपये को भारी दबाव में डाल दिया है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया ₹90 की कगार पर पहुंच गया है, जबकि ब्रिटिश पौंड के मुकाबले यह ₹105 का स्तर पार कर चुका है। यह गिरावट भारतीय मुद्रा बाजार के लिए गंभीर चिंता का संकेत है, क्योंकि यह न सिर्फ वित्तीय स्थिरता को प्रभावित करती है, बल्कि आम जनता और उद्योगों पर भारी आर्थिक बोझ डालती है।

आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि रुपये के कमजोर होने के पीछे कई कारण एक साथ सक्रिय हैं। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में ऊंची ब्याज दरें जारी रहने से विदेशी पूंजी बड़े पैमाने पर सुरक्षित बाजारों की ओर झुक रही है। इससे भारतीय बाजार से पूंजी का बहिर्गमन बढ़ा है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना है। विदेशों में मजबूत होती मुद्राओं के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भी इस संकट का एक बड़ा कारण हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है, और तेल महंगा होते ही आयात बिल बढ़ जाता है, जिसका सीधा असर रुपये के मूल्य पर पड़ता है।

रुपये की इस गिरावट का सबसे ज्यादा प्रभाव महंगाई पर पड़ेगा। पौंड और डॉलर दोनों मजबूत होने से भारत को महंगे आयातों का सामना करना पड़ेगा—चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद हों, औद्योगिक मशीनें, मेडिकल उपकरण, दवाइयाँ या कच्चा तेल। आयात महंगा होगा तो उत्पादन लागत बढ़ेगी, और इसका अंतिम बोझ उपभोक्ता की जेब पर पड़ेगा। पेट्रोल और डीज़ल की संभावित बढ़ती कीमतें परिवहन लागत को बढ़ाएंगी, जिससे खाद्य पदार्थों से लेकर रोज़मर्रा की वस्तुओं तक सब प्रभावित होंगी। इससे खुदरा महंगाई दर फिर ऊपर जा सकती है, जो पहले ही आम जनता को भारी दबाव में डाल रही है।

सरकार और आरबीआई की चुनौती यह है कि वे रुपये को स्थिर रखने के लिए कितनी प्रभावी रणनीति तैयार करते हैं। हालांकि, आरबीआई समय-समय पर हस्तक्षेप कर रहा है, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार का अत्यधिक उपयोग दीर्घकालिक समाधान नहीं माना जा सकता। वहीं सरकार का दावा है कि भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत है और रुपये की यह गिरावट वैश्विक परिस्थितियों का परिणाम है। लेकिन विपक्ष इस दावे को मानने को तैयार नहीं है और सरकार पर आर्थिक कुप्रबंधन व अव्यवस्थित नीतियों का आरोप लगा रहा है। विपक्ष का कहना है कि सरकार की आर्थिक नीतियाँ निवेशकों में भरोसा कायम करने में विफल रही हैं, जिसके कारण रुपये पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

रुपये की लगातार गिरती स्थिति ने देश में आर्थिक बहस को और तेज कर दिया है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि मुद्रा का कमजोर होना केवल विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि यह अर्थव्यवस्था की समग्र सेहत का संकेतक भी है। यदि रुपया इसी तरह कमजोर होता रहा, तो इसका दूरगामी असर विकास दर, रोजगार के अवसरों, व्यापार संतुलन और सरकारी वित्तीय नीतियों पर पड़ेगा। आने वाले कुछ सप्ताह और महीने बेहद निर्णायक होंगे, क्योंकि रुपये की वर्तमान स्थिति यह संकेत दे रही है कि भारत को अपनी आर्थिक दिशा और नीतियों पर तेज़ और गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है।

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