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चीन-अमेरिका के सामने आखिर मोदी की बोलती क्यों बंद हो जाती है?

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महेंद्र सिंह ।  नई दिल्ली 27 नवंबर 2025

देश की कूटनीति का सार इस बात में है कि जब कोई विदेशी शक्ति आपकी संप्रभुता, सम्मान या भूभाग पर सवाल उठाए, तो आपकी सरकार सबसे पहले और सबसे स्पष्ट आवाज़ में जवाब दे। लेकिन आज की सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिन्हें सरकार और समर्थक स्वयं को ‘सबसे मज़बूत नेता’ बताते थकते नहीं, वही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन और अमेरिका की टिप्पणी, दबाव और अपमानजनक बयानों के सामने ऐसे मौन खड़े दिखाई देते हैं, मानो किसी ने उनके शब्दों पर ताला जड़ दिया हो। यह मौन सिर्फ कूटनीतिक कमजोरी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान पर चोट है। जब डोनाल्ड ट्रंप जैसे अनियंत्रित बयानवीर यह दावा करते रहें कि उन्होंने “भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध रोक दिया”, “मोदी ने उनसे मदद मांगी”, “वे भारत को अनुशासित रखते हैं”—और यह बात वह एक बार नहीं, 60 बार दोहराते हैं, तब दिल्ली की चुप्पी समझ से परे है। एक स्वतंत्र राष्ट्र के प्रधानमंत्री पर इतना बड़ा व्यक्तिगत और राष्ट्रीय अपमान, और सरकारी प्रतिक्रिया ऐसी—जैसे कुछ हुआ ही नहीं। क्या यह कूटनीति है या आत्मविश्वासहीन सरकार का बचकाना बचाव? भारत दुनिया की सबसे बड़ी उभरती शक्ति है, लेकिन उसका नेता अमेरिका के खुले अपमान पर एक भी सशक्त बयान नहीं दे पाता—यह न सिर्फ निराशाजनक है, बल्कि यह बताता है कि राष्ट्रवाद केवल चुनावी मंचों पर भाषण देने की चीज़ बन चुका है, न कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में दृढ़ता दिखाने का आधार।

लेकिन ट्रंप की डींगें भी उतनी खतरनाक नहीं जितना चीन का सीधे भारत की संप्रभुता पर हमला। चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग का बयान न सिर्फ उकसावे भरा है, बल्कि यह भारत की राष्ट्रीय अखंडता पर सीधा आक्रमण है। उनका कथन कि “अरुणाचल प्रदेश भारत का illegal setup है” और “अरुणाचल चीन का Zangnan हिस्सा है”, यह केवल शब्दों का खेल नहीं—यह चीन की पुरानी विस्तारवादी मानसिकता का नया अध्याय है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब सीमा पर चीन लगातार आक्रामक है, नए नक्शे जारी कर रहा है, अरुणाचल के गांवों के नाम बदल रहा है, और लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। लेकिन भारत सरकार की प्रतिक्रिया? वही पुरानी कूटनीतिक लाइन—“हमने कड़ा विरोध दर्ज कराया है”। सवाल यह है कि जिस देश के जवानों ने गलवान में अपना खून बहाकर हर इंच की रक्षा की, उस देश की सरकार की आवाज़ इतनी धीमी क्यों पड़ जाती है कि दुनिया उसे सुन भी नहीं पाती? आखिर किस बात का डर है? चीन की आर्थिक दबाव? सीमा पर सैन्य तनाव? या फिर वह राजनीतिक सुविधा जिसकी वजह से सरकार असलियत स्वीकारने से कतराती है?

चलती-फिरती कूटनीति और कठोर वास्तविकता के बीच का अंतर अब साफ दिखने लगा है। दुनिया जानती है कि भारत और चीन के बीच पिछले चार वर्षों में वही हुआ जो सरकार खुलकर बताने से कतराती रही। पेट्रोलिंग प्वाइंट्स तक पहुंच सीमित हुई, लद्दाख की स्थिति बदल गई, और चीन का व्यवहार दिन-ब-दिन अधिक आक्रामक होता गया। लेकिन प्रधानमंत्री ने यह तक कह दिया कि “सीमा पार कोई घुसा ही नहीं”—एक ऐसा वक्तव्य जिसने भारतीय सेना के बलिदान को भी असहज कर दिया। जब प्रधानमंत्री वास्तविकता बोलने से डरते हैं, तो चीन क्यों न भारत पर दावा करे? माओ निंग का बयान इसलिए संभव हुआ क्योंकि चीन को यकीन है कि भारत की सरकार सिर्फ बयानबाज़ी करेगी, ठोस कार्रवाई नहीं। यही कमजोरी चीन की ताकत बन गई है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में चुप्पी कभी-कभी रणनीति होती है, लेकिन यहाँ यह रणनीति नहीं—यह असहायता, भ्रम और दिखावटी शक्ति का मुखौटा है।

भारत को आज आवश्यकता है स्पष्ट, ठोस और दृढ़ नेतृत्व की। दुनिया को यह संदेश देना जरूरी है कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है—यह सिर्फ संविधान का प्रावधान नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय आत्मा से जुड़ा भावनात्मक और ऐतिहासिक प्रश्न है। यदि चीन इसे ‘illegal setup’ कहने की हिम्मत करता है, तो यह केवल कूटनीतिक असहमति नहीं—यह भारत के अस्तित्व को चुनौती देना है। ऐसे में सरकार की चुप्पी या हल्की-फुल्की प्रतिक्रिया न केवल अस्वीकार्य है, बल्कि यह आने वाले संकटों को निमंत्रण भी देती है। चीन की बकवास का जवाब सिर्फ आधिकारिक नोट से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बयान, स्पष्ट सैन्य स्थिति, आर्थिक प्रतिबंधों के विकल्प, और रणनीतिक साझेदारी की कठोरता से दिया जाना चाहिए।

देश यह पूछने में पूरी तरह सही है: जब बात चीन और अमेरिका की आती है तो मोदी जी की आवाज़ क्यों खो जाती है? क्या सत्ता बनाए रखना इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि देश की जमीन और सम्मान की रक्षा हो? राष्ट्रवाद की असली परीक्षा चुनावी रैली में नारे लगाने में नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता पर हमला होने पर बिना झिझक सख्त पलटवार करने में है। भारत की जनता इस जवाब की हकदार है—और अब यह जवाब टाला नहीं जा सकता।

 

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