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प्राइवेट बूथ और बाहरी एजेंसी पर बवाल! ममता बनर्जी नाराज़, EC को भेजी शिकायत

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साजिद अली | नई दिल्ली 25 नवंबर 2025

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आज मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ग़यनेस कुमार को एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़े शब्दों वाला पत्र भेजा है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग के दो हालिया निर्णयों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए “अत्यंत खतरनाक, संदिग्ध और चुनावी निष्पक्षता को प्रभावित करने वाला” बताया है। उनके अनुसार, ये कदम न केवल निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा को चोट पहुंचाते हैं बल्कि पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर भी गहरी चोट करते हैं। ममता बनर्जी ने पत्र में स्पष्ट कहा कि इन निर्णयों से यह संदेह पैदा होता है कि क्या चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है और क्या इसके पीछे किसी दल के निहित स्वार्थ जुड़े हुए हैं।

बाहरी एजेंसियों को डेटा एंट्री सौंपने पर गंभीर सवाल

ममता बनर्जी ने सबसे पहले चुनाव आयोग के उस फैसले पर सवाल उठाया जिसमें CEO, West Bengal ने जिला चुनाव अधिकारियों (DEOs) को निर्देश दिया है कि वे अब SIR और अन्य चुनावी कार्यों के लिए पहले से उपलब्ध contractual data entry operators और Bangla Sahayata Kendra (BSK) कर्मचारियों को काम पर न लगाएँ। इसके बजाय एक नई बाहरी एजेंसी के माध्यम से 1000 डेटा एंट्री ऑपरेटर और 50 सॉफ्टवेयर डेवलपर एक वर्ष के लिए नियुक्त किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने इसे “असामान्य, संदिग्ध और अनावश्यक” बताया।

उनका कहना है कि जिला कार्यालयों में पहले से ही बड़ी संख्या में प्रशिक्षित और अनुभवी कर्मचारी मौजूद हैं जो वर्षों से यही काम कर रहे हैं। ऐसे में अचानक बाहरी एजेंसी को भारी भरकम कॉन्ट्रैक्ट देना कई सवाल खड़े करता है—क्या यह फैसला किसी राजनीतिक दबाव में लिया गया? क्या इससे संविदा कर्मियों के काम की जगह छीनी जा रही है? और क्या यह कदम किसी विशेष कंपनी या समूह को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से उठाया गया है? उन्होंने चेतावनी दी कि इस प्रक्रिया से डेटा सुरक्षा, मतदाता सूची की अखंडता और चुनावी विश्वसनीयता पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है।

प्राइवेट हाउसिंग परिसरों में मतदान केंद्र स्थापित करने पर बड़ा विवाद

पत्र में दूसरा और और भी गंभीर मुद्दा उठाया गया है—चुनाव आयोग द्वारा निजी आवासीय परिसरों और गेटेड सोसाइटीज़ के भीतर पोलिंग स्टेशन स्थापित करने का प्रस्ताव। ममता बनर्जी ने इस पर तीखा विरोध दर्ज करते हुए कहा कि इतिहास में हमेशा सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्थानों के भीतर ही मतदान केंद्र बनाए जाते रहे हैं, ताकि सभी नागरिकों को समान और निर्बाध पहुँच मिल सके। निजी परिसरों में बूथ स्थापित करने से “विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग” को प्राथमिकता मिलेगी और आम जनता—विशेषकर गरीब, दलित, अल्पसंख्यक और ग्रामीण मतदाताओं—के साथ भेदभाव की स्थिति पैदा होगी।

उन्होंने लिखा कि इस तरह की व्यवस्था “fairness, neutrality और equal access” के मूल सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है और इससे मतदान प्रक्रिया पर जनता का भरोसा डगमगा सकता है। उन्होंने कड़े शब्दों में पूछा—“Why? Why? Why?” आखिर ऐसी पहल की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है? क्या यह किसी राजनीतिक दल के दबाव में किया जा रहा है? क्या यह मतदाता पहुँच को नियंत्रित करने का प्रयास है?

चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर खतरा

मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी कि यदि ये दोनों निर्णय लागू होते हैं, तो चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता और विश्वसनीयता गंभीर रूप से प्रभावित होगी। उन्होंने कहा कि यह आवश्यक है कि चुनाव आयोग अपनी गरिमा, निष्पक्षता और पारदर्शिता को बनाए रखे और किसी भी परिस्थिति में समझौता न करे। उन्होंने CEC से तुरंत हस्तक्षेप करने और इन फैसलों की समीक्षा करने की मांग की।

ममता बनर्जी ने अंत में स्पष्ट कहा कि वह इन मुद्दों को हल्के में नहीं लेंगी और लोकतंत्र व जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाती रहेंगी। उनका यह पत्र अब राजनीतिक हलकों में नई बहस और टकराव को जन्म दे सकता है, खासकर उस समय जब देश में चुनावी माहौल तेज़ी पकड़ रहा है और निष्पक्ष चुनाव एक केंद्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।

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