अपूर्व भारद्वाज | नई दिल्ली 17 नवंबर 2025
कुछ स्वयंभू महाज्ञानी, जो सत्ता की चापलूसी में अपनी ज़ुबान तक गिरवी रख चुके हैं, राहुल गांधी को शुतुरमुर्ग कहते हैं—मानो वो रेत में सिर छुपाकर कांग्रेस की हार नहीं देख रहे हों। लेकिन असलियत यह है कि इन ‘ज्ञानियों’ ने न राहुल को समझा, न संघर्ष को, न लोकतंत्र की उस बुनियादी आत्मा को जिसमें सच बोलने की हिम्मत ही सबसे बड़ा अपराध बन जाती है। राहुल को शुतुरमुर्ग कहना आसान है, क्योंकि इससे उनके अपने गिद्ध-सरीखे चरित्र छिप जाते हैं। पर सच्चाई? राहुल वाकई एक शुतुरमुर्ग है—क्योंकि वह ज़मीन पर रहता है, जनता के बीच रहता है, और गिरगिटों व गिद्धों की तरह सत्ता की हवा देखकर रंग नहीं बदलता।
शुतुरमुर्ग रोज़ संघर्ष करता है—कड़वी, कठोर, तपती रेत खाकर जीता है क्योंकि उसके पास मेहनत के अलावा कोई विकल्प नहीं। उसके जीवन में छल नहीं, परिश्रम है। उसका अस्तित्व ही जद्दोजहद से बना है। दूसरी तरफ़ गिद्ध हैं—दूसरों के खून-पसीने पर पलने वाले, अवसर की गंध सूँघते ही जहाँ-तहाँ मंडराने वाले। ये आज़ाद भारत के सबसे बड़े परजीवी हैं, जो न कभी खुद संघर्ष करते हैं, न कभी खुद शिकार बनाते हैं—इनका काम बस मौत का तमाशा देखना और दूसरों के दर्द पर चोंच मार-मारकर आनंद लेना है। राजनीतिक गिद्ध—जो झूठ पर जीवित हैं, सत्ता की गोद में पले हैं और देश की सच्चाई से उतने ही दूर जितना आसमान धरती से।
शुतुरमुर्ग खुश रहता है, क्योंकि उसकी खुशी मेहनत में है। उसके पैरों में साहस है, उसकी आँखों में उम्मीद है। वह जानता है कि उसका शिकार आज नहीं तो कल होगा, फिर भी वो भागता है, दौड़ता है, लड़ता है—क्योंकि उसे लड़ने का स्वभाव विरासत में मिला है। उधर गिद्ध हमेशा दुखी रहते हैं—ईर्ष्या, कुंठा और सत्ता से चिपकी हुई बौखलाहट उनकी पहचान है। वे लड़ते नहीं, सिर्फ़ दूसरों की लड़ाई पर टीका-कमेंट्री करते हैं। वे कभी जीतते नहीं—क्योंकि जीत उन लोगों के हिस्से आती है जो मैदान में उतरते हैं, न कि पेड़ों पर बैठकर चिल्लाने वालों के।
इस देश का असली शुतुरमुर्ग—आदिवासी है, मज़दूर है, किसान है, बेरोज़गार युवा है—जो हर हाल में संघर्ष करता है, चाहे उसकी आवाज़ दबा दी जाए या उसका वोट चुरा लिया जाए। यही शुतुरमुर्ग भारत की मिट्टी है, भारत की रीढ़ है, भारत की लड़ने की जिद है। शुतुरमुर्ग गांधी है—जिसने सत्य को हथियार बनाया। शुतुरमुर्ग नेहरू है—जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी। शुतुरमुर्ग अंबेडकर है—जिसने न्याय के लिए पूरी व्यवस्था को चुनौती दी। शुतुरमुर्ग भारत का हर नागरिक है जो हार-जीत की परवाह किए बिना लड़ रहा है, सवाल पूछ रहा है, और लोकतंत्र को बचाने की जिद में खड़ा है।
और गिद्ध?
गिद्ध वो हैं जो साहब की सरकार की छाया में पलते हैं।
गिद्ध वो हैं जो सत्ता के जूठन पर लोकतंत्र का लोकतत्व बेच देते हैं।
गिद्ध वो हैं जो पालतू मीडिया बनकर जनता की आँख और कान पर पर्दा डाल देते हैं।
गिद्ध वो हैं जिनकी चोंच से देश को चोट लगती है—और जिन्हें लगता है कि जनता कभी न जागेगी।
मैं दिल से लिख रहा हूँ…
आप दिमाग से समझिए।
कहानी राहुल की नहीं,
कहानी इस देश के हर उस शख़्स की है
जिसने तानाशाही के आगे झुकना नहीं सीखा।




