आलोक रंजन, राजनीतिक विशेषज्ञ | पटना/ नई दिल्ली 12 नवंबर 2025
पटना की ठंडी होती शामों के बीच बिहार की सियासत में गर्मी लगातार बढ़ रही है। मतदान खत्म हो चुका है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में अभी भी बेचैनी है। सन्नाटा है, पर उस सन्नाटे के भीतर हलचल है। हर दल अपनी जीत का डंका बजा रहा है, लेकिन भीतरखाने सबको चिंता है कि अगर नतीजे उम्मीदों के मुताबिक नहीं आए, तो क्या करना है? यही वजह है कि हर राजनीतिक दल अब “प्लान B” पर काम कर रहा है। ज़मीन पर गठबंधन धर्म का पालन किसी ने नहीं किया — बीजेपी और जेडीयू के बीच का रिश्ता पूरे चुनाव के दौरान तल्ख़ रहा। बीजेपी के कई नेताओं ने खुलेआम नीतीश को हाशिए पर रखा और चिराग पासवान ने तो जेडीयू के खिलाफ बाकायदा मोर्चा खोल दिया। दूसरी ओर महागठबंधन में भी तालमेल की कमी साफ दिखाई दी — लगभग 25 सीटों पर कांग्रेस और आरजेडी के बीच “दोस्ताना लड़ाई” ने महागठबंधन की एकता पर सवाल खड़े किए। यही कारण है कि अब सभी दलों को महसूस हो रहा है कि परिणाम आने के बाद राजनीतिक अंकगणित किसी भी दिशा में जा सकता है। सत्ता का लड्डू आखिर किसकी थाली में गिरेगा, इसका जवाब 14 नवंबर की दोपहर ही तय करेगी।
चुनाव के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बिहार का चुनाव उतना आसान है, जितना एक्जिट पोल दिखा रहे हैं? करीब 95% सर्वे एजेंसियों ने एनडीए गठबंधन की जीत का अनुमान जताया है। बड़े-बड़े चैनलों ने बीजेपी-जेडीयू को बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करते दिखाया है। लेकिन दिलचस्प यह है कि दो सर्वे ऐसे भी आए हैं जो पूरे समीकरण को पलटते दिख रहे हैं। DB LIVE (देशबंधु) ने अपने सर्वे में साफ कहा है कि बिहार में महागठबंधन की सरकार बनेगी, जबकि NEWS PINCH नामक नए समूह ने इस चुनाव को फोटो फिनिशिंग वाला करार दिया है। यानी यह चुनाव आखिरी राउंड की गिनती तक रोमांच से भरा रहेगा। राजनीति के जानकार कह रहे हैं कि बिहार की जनता ने इस बार पूरी चुप्पी के साथ मतदान किया है और यही चुप्पी 14 तारीख को कई नेताओं की मुस्कान या मायूसी का कारण बनेगी।
दिल्ली से लेकर पटना तक गुप्त बैठकों का दौर जारी है। सत्ता के गलियारों में असामान्य हलचल देखी जा रही है। बीजेपी के शीर्ष नेता लगातार राज्य इकाई से संपर्क में हैं, जबकि जेडीयू के बड़े नेता कुछ ऐसे चेहरों से मिल रहे हैं जिनसे हाल के वर्षों में दूरी थी। सूत्रों का दावा है कि पटना के एक होटल में जेडीयू और आरजेडी के वरिष्ठ नेताओं की गुप्त बैठक हुई है। यह मुलाकात इस ओर इशारा करती है कि चुनाव के बाद दोनों पक्ष किसी न किसी समझौते की ज़मीन तलाश सकते हैं। एनडीए के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा — “अगर एक्जिट पोल सच होते, तो अब तक बीजेपी कार्यालयों में जश्न शुरू हो जाता। लेकिन इस बार मामला पेचीदा है, क्योंकि वोटिंग पैटर्न और लोकल मुद्दे दिल्ली के आकलन से बहुत अलग हैं।” इस बयान से यह साफ है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर भी संशय की लहर है और हर कोई परिणाम से पहले किसी “बैकअप प्लान” पर विचार कर रहा है।
वहीं आरजेडी में आत्मविश्वास का माहौल है। तेजस्वी यादव लगातार प्रेस कॉन्फ्रेंस और रैलियों में दावा कर रहे हैं कि उनकी पार्टी इस बार बिहार की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरेगी। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, आरजेडी को 80 के आसपास सीटें मिलने की उम्मीद है। यही आंकड़ा उसे सबसे बड़ी पार्टी बना सकता है। दूसरी ओर, जेडीयू के 60 सीटों के आसपास रहने की संभावना जताई जा रही है। अगर ऐसा होता है, तो नीतीश कुमार एक बार फिर सत्ता की चाबी अपने हाथ में रख सकते हैं। बीजेपी के लिए यह स्थिति असहज हो सकती है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से पार्टी के कई नेता यह संकेत देते रहे हैं कि नीतीश का दौर अब समाप्त होना चाहिए। उधर चिराग पासवान, जीतन राम मांझी, मुकेश साहनी और प्रशांत किशोर की जन सुराज जैसी पार्टियों की स्थिति बेहद कमजोर बताई जा रही है। चुनावी नतीजे के बाद ये छोटी पार्टियां सत्ता के गठजोड़ में सिर्फ प्रतीकात्मक भूमिका निभा सकती हैं।
नीतीश कुमार के लिए यह चुनाव केवल सत्ता में बने रहने का नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक विरासत को सम्मानजनक तरीके से समाप्त करने का भी सवाल है। पटना की गलियों में अब यह चर्चा आम है कि यह नीतीश का आख़िरी विधानसभा चुनाव है। उन्होंने खुद कई मौकों पर कहा भी है कि वह राजनीति से सन्यास लेने का मन बना चुके हैं। लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि जेडीयू को इतना सम्मानजनक परिणाम मिले कि पार्टी के भीतर उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाए। यही वजह है कि नीतीश अब हर संभावित समीकरण के लिए खुले हैं — चाहे वह आरजेडी से हाथ मिलाने की संभावना ही क्यों न हो। उनका लक्ष्य अब सत्ता नहीं, बल्कि एक “सम्मानजनक विदाई” है, जिसमें उनकी राजनीतिक यात्रा की गरिमा बनी रहे।
तेजस्वी यादव ने आज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एक और सियासी हलचल पैदा कर दी। उन्होंने नतीजों से पहले ही दावा कर दिया कि “हमारी सरकार आ रही है और हम शपथ लेंगे।” साथ ही उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों को सख्त चेतावनी दी कि “अगर किसी अधिकारी ने गड़बड़ी की तो हम छोड़ने वाले नहीं हैं।” तेजस्वी के इस बयान ने नौकरशाही के भीतर हलचल मचा दी है। कई अफसरों के बीच यह चर्चा है कि अगर आरजेडी की सरकार बनी तो कार्रवाई की पहली लिस्ट तैयार है। प्रशासनिक हलकों में डर है कि नए सियासी समीकरण के साथ कई चेहरे अपनी कुर्सियां खो सकते हैं।
अब सबकी निगाहें 14 नवंबर पर टिकी हैं, जब तस्वीर साफ होगी कि बिहार की सत्ता किसके हाथ में जाएगी। यह चुनाव अब सिर्फ सीटों का खेल नहीं रह गया है, बल्कि रणनीति, समझदारी और बाद के गठजोड़ों की परख बन गया है। एनडीए अपनी केंद्रीय रणनीति के साथ मैदान में है, तो महागठबंधन तेजस्वी के आत्मविश्वास पर सवार है। यह मुकाबला अब सीधा नहीं रहा — यह “फोटो फिनिश” वाला चुनाव है, जहां हर वोट, हर सीट, और हर समझौता सत्ता की दिशा तय करेगा। 14 नवंबर की सुबह तक पटना की हवा में यही सवाल गूंजता रहेगा —”कौन बनेगा बिहार का असली बादशाह?”




