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दिल्ली एयरपोर्ट पर GPS हमला — 800 उड़ानें खतरे में, और गृहमंत्री पटना में पर्दों के पीछे के खेल में व्यस्त

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दिल्ली एयरपोर्ट पर GPS सिग्नल से खिलवाड़ कर 800 से अधिक उड़ानों को खतरे में डाल देने वाली सनसनीखेज घटना ने राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की रीढ़ हिला दी है—और यह सब तब हुआ जब देश के गृहमंत्री पटना में अपने होटल के CCTV सिस्टम पर पर्दे डालकर वोट के खेल में उलझे हुए थे। राजधानी और उसके आसपास लगातार मिल रहे आतंकी मॉड्यूलों के बीच यह बड़ा साइबर हमला केवल एक तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश का संकेत है।

 जांच के शुरुआती निष्कर्ष बताते हैं कि यह घटनाक्रम GPS स्पूफिंग या जैमिंग का परिणाम हो सकता है, जिसने विमानों की पोज़िशनिंग, ऊंचाई और रनवे अलाइनमेंट तक को गुमराह कर दिया। भारत के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले एयरस्पेस में ऐसा हमला सीधे-सीधे सुरक्षा एजेंसियों की गंभीर चूक को उजागर करता है और यह सवाल खड़ा करता है कि जब राजधानी का आसमान असुरक्षित था, तब मंत्रालय की प्राथमिकताएँ आखिर कहाँ उलझी थीं? कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा है कि यह गंभीर मामला है, जो लाखों यात्रियों की सुरक्षा से सीधा समझौता करता है। इसकी गहन जाँच होनी चाहिए और सरकार को बताना चाहिए कि पिछले सप्ताह 800 से अधिक उड़ानें क्यों बाधित हुईं।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर इतनी सख़्ती से मॉनिटर किए जाने वाले एयरस्पेस में यह छेड़छाड़ हुई कैसे? क्या DGCA, CISF, RAW और IB जैसी एजेंसियों को इसका ज़रा-सा भी संकेत नहीं मिला? यदि नहीं मिला, तो ये चूक है या फिर किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर मॉड्यूल की सोची-समझी चाल? यह भी शक जताया जा रहा है कि किसी विदेशी हैकर ग्रुप या दुश्मन देश की ओर से एयरपोर्ट GPS सिस्टम को निशाना बनाया गया हो। दुनिया के कई देशों में पहले भी GPS जैमिंग के ज़रिए हवाई जहाज़ों को गुमराह करने की कोशिशें हो चुकी हैं, और अब भारत में ऐसे हमले का संकेत सामने आना एक चेतावनी है कि साइबर युद्ध अब हमारे दरवाज़े तक पहुँच चुका है।

सरकार की जिम्मेदारी अब केवल बयान देने तक सीमित नहीं रह सकती। आवश्यक है कि इस मामले पर न केवल पारदर्शी जांच हो, बल्कि एक स्वतंत्र तकनीकी आयोग या संसदीय समिति से इसकी गहराई से समीक्षा कराई जाए। देश के सभी प्रमुख हवाई अड्डों पर तुरंत GPS स्पूफिंग डिटेक्शन सिस्टम लगाए जाएँ और बैकअप नेविगेशन नेटवर्क मजबूत किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसे हमलों से बचाव हो सके। इसके साथ ही, एयरपोर्ट अथॉरिटीज़ और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को देश के सामने साफ़-साफ़ बताना चाहिए कि असल में क्या हुआ—ताकि जनता में डर या भ्रम की स्थिति न बने और विश्वास कायम हो।

यह घटना मात्र एक “तकनीकी फॉल्ट” नहीं है, बल्कि एक संगठित साइबर हमले की संभावित शुरुआत है। अगर सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, तो अगली बार ऐसे फेक GPS सिग्नल किसी बड़े हादसे का कारण बन सकते हैं। देश को विश्वास दिलाना आवश्यक है कि—“भारत के सबसे सुरक्षित एयरस्पेस में यह साजिश कैसे हुई और इसके पीछे कौन है?”

 

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