महेंद्र सिंह, राजनीतिक विशेषज्ञ | 2 नवंबर 2025
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया दौरा राजनीतिक मर्यादा और लोकतांत्रिक गरिमा दोनों पर गहरी चोट करता दिखा। जब बिहार की जनता महंगाई, बेरोजगारी और पलायन जैसी ज्वलंत समस्याओं से जूझ रही है, तब प्रधानमंत्री ने एक बार फिर जन मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए नफरत और विभाजन की राजनीति का सहारा लिया। रविवार (2 नवंबर) को आरा की रैली में उन्होंने पाकिस्तान में हुए धमाकों का हवाला देते हुए कहा — “धमाके पाकिस्तान में हुए और नींद गांधी परिवार की उड़ी।” यह बयान न केवल अभद्र था बल्कि लोकतांत्रिक संवाद के लिए विषैला भी। विपक्ष पर “घुसपैठियों को वोटर लिस्ट में जोड़ने की साजिश” का आरोप लगाकर मोदी ने जनता की भावनाओं को भड़काने की कोशिश की, जो एक जिम्मेदार प्रधानमंत्री से कतई शोभा नहीं देता।
यह पहली बार नहीं है जब मोदी ने चुनावी माहौल में नफरत का हथियार इस्तेमाल किया हो। बिहार की उस धरती पर, जहां छठ पूजा की एकता और सद्भाव का संदेश गूंजता है, उन्होंने अपने भाषणों में हिंदू-मुस्लिम और क्षेत्रीय विभाजन को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। छपरा रैली में उन्होंने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन पर हमला करते हुए कहा कि उन्होंने बिहारियों का “अपमान” किया है — जबकि तमिलनाडु सरकार ने बाद में स्पष्ट किया कि मोदी ने तथ्य तोड़-मरोड़ कर क्षेत्रीय तनाव फैलाने की कोशिश की। लोकतंत्र में यह सबसे खतरनाक प्रवृत्ति है — झूठ को बार-बार दोहराकर सच बना देना।
राहुल गांधी ने आरा की रैली में मोदी को सीधे चुनौती दी और कहा कि प्रधानमंत्री “ट्रंप से डरते हैं और चुनिंदा उद्योगपतियों के इशारे पर नीतियां चलाते हैं।” लेकिन मोदी ने जनता को जवाब देने के बजाय फिर वही पुराना आरोप दोहराया — “जंगलराज”, “भ्रष्टाचार” और “परिवारवाद”। सवाल यह है कि जब बिहार में बेरोजगारी दर 15 प्रतिशत से ऊपर है और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है, तब प्रधानमंत्री विकास की बात क्यों नहीं करते?
बिहार में नफरत के इस एजेंडे को और हवा दी गृह मंत्री अमित शाह ने, जिन्होंने अपनी रैली में बांग्लादेशी “घुसपैठियों” को बिहार के गरीबों का राशन और रोजगार छीनने वाला बताया। यह वही भाषा है जिसने असम और मणिपुर में सांप्रदायिक तनाव बढ़ाया था। दुर्भाग्य यह है कि चुनाव आयोग इन बयानों पर मौन साधे बैठा है। विपक्षी नेताओं के बयानों पर तुरंत कार्रवाई, लेकिन सत्ता पक्ष की नफरत भरी भाषा पर कोई रोक नहीं — यह लोकतंत्र नहीं, “चयनित चुप्पी” है।
वास्तविकता यह है कि पिछले दस वर्षों में मोदी सरकार ने देश की आर्थिक रीढ़ कमजोर कर दी है। नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे कारोबारियों को खत्म कर दिया, युवाओं को रोजगार के बजाय ‘अग्निवीर योजना’ में धकेल दिया गया। बिहार के युवा आज मजदूर बनकर परदेस में भटक रहे हैं। फिर भी मोदी हर रैली में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर वोट मांग रहे हैं, जैसे भावनाओं के सौदे से विकास हो जाएगा।
बिहार की जनता को अब यह तय करना होगा कि उन्हें नफरत चाहिए या नीतियां। प्रधानमंत्री का चुनावी घोषणापत्र “एक करोड़ नौकरियों” का दावा करता है, जबकि पिछले चुनावों के वादे अभी तक पूरे नहीं हुए। दूसरी ओर, महागठबंधन बेरोजगारी, शिक्षा, और सामाजिक न्याय की बात कर रहा है — जिसे एनडीए “एक्सटॉर्शन रेट लिस्ट” कहकर मज़ाक बना रहा है। लेकिन असल मज़ाक तो वो है जो बिहार के बेरोजगार युवाओं, किसानों और मजदूरों के साथ सालों से चल रहा है।
अब सवाल सीधा है — क्या बिहार नफरत की राजनीति के सहारे विकास करेगा? या फिर वह उस एकता की राह चुनेगा, जो उसकी मिट्टी की पहचान रही है? लोकतंत्र की असली परीक्षा अब होगी — जब जनता अपने मत से यह तय करेगी कि उन्हें झूठ और विभाजन का शासन चाहिए या उम्मीद और बदलाव की सरकार।




