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दिल्ली में प्रदूषण का कहर: आंखों के मरीजों में 60% की बढ़ोतरी, बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित

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नई दिल्ली, 31 अक्टूबर 2025

देश की राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण ने एक बार फिर से गंभीर रूप अख्तियार कर लिया है। जहरीली हवा और घनी स्मॉग की परत ने न सिर्फ लोगों की सांसें मुश्किल कर दी हैं, बल्कि अब इसका सीधा असर आंखों पर भी पड़ रहा है। नेत्र रोग विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार आंखों से जुड़ी बीमारियों के मामलों में करीब 60 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अस्पतालों में आने वाले मरीजों को आंखों में जलन, सूखापन, एलर्जी, लालपन और लगातार पानी आने जैसी समस्याएं हो रही हैं। खास बात यह है कि इस बढ़ते प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर बच्चों और बुजुर्गों पर पड़ रहा है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से ही कमजोर होती है।

दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों में ऐसे मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो आंखों की जलन के साथ गले में खराश, सांस लेने में परेशानी, खांसी और सीने में जकड़न जैसी शिकायतें लेकर पहुंच रहे हैं। कई अस्पतालों ने इन मरीजों के लिए विशेष वार्ड तक बना दिए हैं। एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली-एनसीआर के लगभग 75 प्रतिशत घरों में कम से कम एक सदस्य को वायरल, फ्लू या कोविड जैसे लक्षण हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रदूषण की वजह से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ रहे नकारात्मक असर का नतीजा है।

दिल्ली आई सेंटर के चेयरमैन डॉ. हरबंस लाल ने बताया कि हर साल दिवाली के बाद आंखों की शिकायतों में भारी वृद्धि होती है। इस साल भी स्थिति गंभीर है। उन्होंने कहा, “हमने देखा है कि इस बार आंखों में जलन, खुजली और लालपन के मामले लगभग 50 से 60 प्रतिशत तक बढ़े हैं। जिन लोगों को पहले से एलर्जी या आंखों की समस्या है, वे इस प्रदूषण के कारण और ज्यादा असुविधा झेल रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि प्रदूषण, धूल और रासायनिक तत्वों का मिश्रण आंखों की सतह के लिए बेहद हानिकारक साबित हो रहा है। लंबे समय तक इसका असर बना रहा तो यह दृष्टि को भी प्रभावित कर सकता है।

ट्रैफिक पुलिस कर्मियों की सेहत पर खतरा, दिल्ली पुलिस ने अपनाए सुरक्षा उपाय

दिल्ली पुलिस ने अपने ट्रैफिक विभाग के कर्मियों को प्रदूषण और ठंड से बचाने के लिए एक व्यापक योजना तैयार की है। लगातार घटती वायु गुणवत्ता के बीच ट्रैफिक पुलिस कर्मी सबसे अधिक जोखिम झेलते हैं, क्योंकि वे दिनभर सड़कों पर खुले में काम करते हैं। ऐसे में दिल्ली पुलिस ने अपने कर्मचारियों को उच्च गुणवत्ता वाले एयर-फिल्टर मास्क, सर्दी से बचाव के लिए विशेष वर्दी और नियमित स्वास्थ्य जांच की सुविधा देने का निर्णय लिया है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि “हर साल स्मॉग के मौसम में ट्रैफिक पुलिस कर्मी सबसे ज्यादा प्रदूषण का सामना करते हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा के लिए विशेष कदम उठाना बेहद जरूरी था।”

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के चलते ट्रैफिक पुलिस कर्मी आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ और थकान जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि इस साल सुरक्षा उपकरणों की उपलब्धता और स्वास्थ्य जांचों की निगरानी पहले से अधिक सख्ती से की जाएगी, ताकि कर्मियों की सेहत पर इस जहरीली हवा का असर कम से कम हो।

क्लाउड सीडिंग तकनीक पर राहत की खबर, IIT कानपुर का बयान — “यह इंसानों और पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित”

वहीं दूसरी ओर, बढ़ते प्रदूषण से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने ‘क्लाउड सीडिंग’ यानी कृत्रिम वर्षा को एक आपातकालीन उपाय के रूप में अपनाने की बात कही है। IIT कानपुर के निदेशक प्रोफेसर मनीन्द्र अग्रवाल ने कहा है कि यह तकनीक इंसानों और पर्यावरण दोनों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में रसायन का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे बादलों में वर्षा उत्पन्न की जा सके। इसे “SOS Measure” कहा गया है, जिसका उद्देश्य प्रदूषण के स्तर को कम करना है।

प्रोफेसर अग्रवाल ने बताया कि पहले के दो प्रयासों में भले ही कृत्रिम बारिश नहीं हो सकी, लेकिन उनसे मिले वैज्ञानिक आंकड़े भविष्य के प्रयोगों के लिए बेहद उपयोगी साबित होंगे। उन्होंने कहा, “हम यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि किस मात्रा में सीडिंग मटेरियल और नमी की स्थिति बारिश कराने में प्रभाव डालती है। यह हमें भविष्य में और सटीक परिणाम हासिल करने में मदद करेगा।”

दिल्ली-एनसीआर में हवा का जहरीलापन हर गुजरते दिन के साथ बढ़ता जा रहा है। इस प्रदूषण ने अब आंखों की सेहत को भी खतरे में डाल दिया है। डॉक्टरों के मुताबिक, हालात को सुधारने के लिए प्रशासनिक स्तर पर त्वरित कदम उठाने की जरूरत है। वहीं ट्रैफिक पुलिस और आम नागरिकों के लिए सुरक्षा उपकरणों का इस्तेमाल और भी अनिवार्य हो गया है। वैज्ञानिकों की उम्मीदें अब कृत्रिम बारिश जैसी तकनीकों पर टिकी हैं, लेकिन जब तक प्रदूषण के मूल स्रोतों पर लगाम नहीं लगाई जाएगी, तब तक राहत की उम्मीद करना मुश्किल है।

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