भारत की सामरिक शक्ति को बड़ा झटका लगा है। ताजिकिस्तान स्थित भारत का पहला और एकमात्र विदेशी एयरबेस — आयनी एयरबेस — अब इतिहास बन गया है। रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने चीन और रूस के भारी दबाव में इस एयरबेस को खाली कर दिया है। यह वही बेस था जो बीते 25 वर्षों से भारत की पश्चिमी सीमाओं पर सामरिक संतुलन का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता था।
इस एयरबेस को भारत ने लगभग 70 मिलियन डॉलर की लागत से विकसित किया था, और इसे भारतीय वायुसेना के Su-30 MKI जैसे लड़ाकू विमानों के संचालन योग्य बनाया गया था। यह बेस पाकिस्तान के खिलाफ भारत की सबसे बड़ी बढ़त था — जहाँ से भारतीय विमान कुछ ही मिनटों में पेशावर और उत्तरी पाकिस्तान तक पहुंच सकते थे। अफगानिस्तान के हालातों पर निगरानी और आतंकवाद-रोधी अभियानों में यह भारत का ‘मूक प्रहरी’ था।
मगर अब यह रणनीतिक गहराई खत्म हो चुकी है। भू-राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह विकास मोदी सरकार की विदेश नीति की विफलता का प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2015 में ताजिकिस्तान दौरा और उस समय की “रणनीतिक स्वायत्तता” की बातें अब खोखली लग रही हैं। भारत ने न तो रूस से सामरिक दूरी बनाई, न चीन से टकराव का स्पष्ट रुख अपनाया — और परिणामस्वरूप दोनों शक्तियों के दबाव में यह महत्वपूर्ण एयरबेस भारत के हाथ से निकल गया।
विश्लेषक कहते हैं कि भारत की यह हार केवल एक एयरबेस की नहीं, बल्कि पूरे मध्य एशिया में उसके प्रभाव के पतन की कहानी है। “भालू और ड्रैगन दोनों से दोस्ती की कीमत यही होती है”, एक रक्षा विशेषज्ञ ने टिप्पणी की। चीन अब न केवल हिमालयी सीमा पर, बल्कि मध्य एशिया के आकाश में भी भारत की रणनीतिक ‘निगाह’ को बंद करने में सफल हो गया है।
भारत का पाकिस्तान पर जो हवाई दबाव था — वह अब लगभग समाप्त हो गया है। “आयनी” से उड़ान भरने वाले लड़ाकू विमानों की मारक क्षमता पाकिस्तान की उत्तरी सीमा पर निर्णायक भूमिका निभा सकती थी, लेकिन अब यह विकल्प खत्म हो गया है। मोदी सरकार की “मल्टी-अलाइनमेंट” (बहु-संरेखण) नीति को विशेषज्ञ अब “मल्टी-सरेन्डर” (बहु-समर्पण) की संज्ञा दे रहे हैं।
कांग्रेस और विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा है कि मोदी सरकार ने देश की सामरिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। सोशल मीडिया पर #ModiHaiTohMumkinHai हैशटैग के साथ आलोचना तेज हो गई है, जिसमें लोगों ने पूछा है — “कहाँ गया ‘विश्वगुरु’ भारत का सपना, जब अपनी रणनीतिक चौकी भी बचा नहीं पाए?”
आयनी एयरबेस का बंद होना सिर्फ एक सैन्य निर्णय नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति की दिशा और वैश्विक विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर भारत अपने सामरिक साझेदारों को बनाए रखने में विफल रहा, तो आने वाले वर्षों में देश की क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रभाव दोनों पर गहरा असर पड़ेगा।




