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क्या बीजेपी की खामोशी महज़ ‘मौन’ है, या फिर बिहार चुनाव के लिए ध्रुवीकरण की सुनियोजित ‘रणनीति’?

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता राघवेंद्र प्रताप सिंह द्वारा सिद्धार्थनगर में दिया गया शर्मनाक बयान — जिसमें उन्होंने खुले मंच से “मुस्लिम लड़कियों को उठाओ, हम नौकरी और सुरक्षा देंगे” कहकर खुलेआम हिंसा और अपमान का आह्वान किया — यह किसी भी तरह से केवल एक व्यक्तिगत नेता की अनियंत्रित टिप्पणी या निजी भूल का मामला नहीं है। यह बयान उस राजनीतिक मानसिकता का एक सार्वजनिक और मुखर प्रदर्शन है जिसे पिछले एक दशक से अधिक समय से देश के राजनीतिक परिदृश्य में योजनाबद्ध तरीके से बोया और सींचा जा रहा है। सबसे अधिक चिंताजनक और खतरनाक पहलू यह है कि इस घिनौने और भड़काऊ कृत्य पर सत्ताधारी पार्टी, यानी बीजेपी, की जो लंबी और घनी चुप्पी है, वह इस ज़हर का सबसे प्रभावी वाहक बन रही है। 

जब कोई सत्तारूढ़ दल का ज़िम्मेदार पद पर बैठा नेता धर्म और लिंग के आधार पर खुले तौर पर हिंसा और सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देता है, और इस पर न तो पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व एक शब्द बोलता है और न ही प्रशासन या पुलिस कोई त्वरित कार्रवाई करती है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कोई क्षणिक गलती नहीं, बल्कि एक सोची-समझी, रणनीतिक चुप्पी है। यह मौन नफरत भरे एजेंडे को राजनीतिक वैधता प्रदान करता है और समाज में निहित “हम बनाम वो” के विभाजनकारी नैरेटिव की आग को भड़काने का काम करता है, ताकि चुनावी लाभ सुनिश्चित किया जा सके।

उत्तर प्रदेश जैसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से जागरूक राज्य में, जहाँ प्रशासन की तत्परता इतनी अधिक है कि एक मामूली या आलोचनात्मक सोशल मीडिया पोस्ट या ट्वीट पर भी तत्काल और कठोर कानूनी कार्यवाही हो जाती है, वहाँ एक खुले मंच से दिए गए ऐसे उकसावे भरे और समाज को तोड़ने वाले बयान पर, जिसका वीडियो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है, न कोई प्राथमिक FIR दर्ज की जाती है, न कोई नोटिस जारी होता है और न ही कोई गिरफ्तारी होती है, यह स्थिति महज़ पुलिस प्रशासन की विफलता का संकेत नहीं है। 

यह स्पष्ट रूप से शीर्ष राजनीतिक संरक्षण का प्रमाण है। यह चुप्पी न केवल कानून के शासन को कमज़ोर करती है, बल्कि यह एक खतरनाक दोहरे मापदंड (Double Standard) को भी स्थापित करती है: अगर यही बयान किसी विपक्षी दल के नेता द्वारा दिया जाता, तो ‘कानून-व्यवस्था’ और ‘सामाजिक सौहार्द’ के नाम पर वही पुलिस तत्काल सक्रिय होकर उसे जेल में डाल देती। इस प्रकार, यह चुप्पी कानून की नहीं, बल्कि सत्ता के राजनीतिक हित की सेवा कर रही है, जो यह दर्शाती है कि पुलिस बल राजनीतिक आकाओं के इशारों पर काम कर रहा है और नफरत भरे भाषणों को बीजेपी का मौन समर्थन प्राप्त है।

बीजेपी के इस मौन के पीछे जो सबसे बड़ी और तात्कालिक राजनीतिक गणना दिखाई देती है, वह है आसन्न बिहार विधानसभा चुनाव। बीजेपी और उसके रणनीतिकार इस बात को भली-भाँति जानते हैं कि बिहार का राजनीतिक मैदान हमेशा से ही धर्म और जाति के जटिल समीकरणों का केंद्र रहा है। जब देश की जनता या मतदाता रोज़गार के संकट, आसमान छूती महंगाई, शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और स्वास्थ्य सेवाओं की उपेक्षा जैसे महत्वपूर्ण वास्तविक मुद्दों पर सवाल उठाना शुरू कर देते हैं, तब सत्ताधारी दल के लिए सबसे पुराना और सबसे प्रभावी हथियार होता है सामाजिक ध्रुवीकरण का सहारा लेना।

राघवेंद्र सिंह जैसे नेताओं के बयान, जो उत्तर प्रदेश में दिए गए हैं, वे न केवल यूपी के भीतर एक विषैला सामाजिक और राजनीतिक माहौल तैयार करते हैं, बल्कि उनकी नफरती गूँज को बिहार की चुनावी सीमाओं तक एक सुनियोजित लहर के रूप में भेजा जाता है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि चुनावी विमर्श का केंद्र बिंदु “विकास”, “रोज़गार” या “शासन” जैसे ज़रूरी विषयों से हटकर पूरी तरह से “मज़हब”, “धर्मरक्षा” और “राष्ट्रवाद” पर टिक जाए। यह वही पुराना और आजमाया हुआ चुनावी फॉर्मूला है, जहाँ वोट बटोरने से पहले समाज में नफरत का बीज बोया जाता है, और फिर ‘धर्म को खतरे’ के नाम पर उसे राजनीतिक लाभ के रूप में काट लिया जाता है।

यदि बीजेपी इस बयान को वास्तव में एक व्यक्तिगत ग़लती या पार्टी लाइन का उल्लंघन मानती, तो उसके लिए राघवेंद्र सिंह को 24 घंटे के भीतर पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर देना एक सामान्य और अपेक्षित कार्रवाई होती। लेकिन ऐसा न करने और इस पर पूरी तरह से मौन साध लेने से पार्टी ने एक स्पष्ट और भयानक संदेश दिया है: कि पार्टी की असली विचारधारा अब केवल और केवल सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि सुनियोजित सामाजिक विभाजन (Divisive Politics) को बढ़ावा देना है। 

यह नेता की टिप्पणी महज एक व्यक्तिगत अपराध नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक विचारधारा और मानसिकता की अभिव्यक्ति है जो ‘लव जिहाद’, ‘घर वापसी’ और ‘राम नाम पर राजनीति’ जैसे नारों के माध्यम से शुरू हुई थी, और अब यह सीधे तौर पर देश की महिलाओं और अल्पसंख्यकों की व्यक्तिगत गरिमा, सुरक्षा और सम्मान पर हमला करने लगी है। पार्टी का यह मौन इन नेताओं को एक अघोषित लाइसेंस प्रदान करता है कि वे बिना किसी डर या परिणाम की चिंता के इस विभाजनकारी एजेंडे को आगे बढ़ाएँ।

एक स्वस्थ और मज़बूत लोकतंत्र की वास्तविक ताकत नागरिकों के विरोध की आवाज़ और सत्ता की आलोचना में निहित होती है। लेकिन जब सत्ता पर काबिज़ दल स्वयं ही इस विरोध को एक ‘अपराध’ बना देता है, या नफरती बयानों के माध्यम से समाज को बांटने का काम करता है, तो आम नागरिक का डर और उसका मौन ही अंततः तानाशाही (Authoritarianism) का सबसे बड़ा और सहायक हथियार बन जाता है।

इस पूरे मामले में बीजेपी की सधी हुई चुप्पी, प्रशासन और पुलिस की निष्क्रियता और समाज में बढ़ती हुई डर की भावना — ये तीनों कारक मिलकर एक ऐसा विषैला सामाजिक-राजनीतिक माहौल बना रहे हैं, जिसमें सार्वजनिक रूप से कही गई नफरत और हिंसा की बातें अब ‘सामान्य’ या ‘स्वीकार्य’ लगने लगी हैं, जबकि मानवीयता और सामाजिक सौहार्द की भावना असहज और अप्रासंगिक होती जा रही है। 

आज यह सवाल केवल एक नेता के अपमानजनक बयान या बीजेपी के ‘एक व्यक्ति’ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस संपूर्ण राजनीतिक विचारधारा पर प्रश्नचिन्ह लगाता है जो जानबूझकर नफरत को एक राजनीतिक नीति का दर्जा दे रही है और अपनी चुप्पी को इस नीति के लिए एक प्रभावी समर्थन बना चुकी है। 

यदि एक जागरूक और ज़िम्मेदार समाज के रूप में हमने अभी इस ज़हर के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ नहीं उठाई, तो आने वाले चुनावी रण केवल वोटों की गिनती नहीं होंगे — वे वास्तव में देश के संवैधानिक मूल्यों और उसकी लोकतांत्रिक आत्मा का एक अंतिम और निर्णायक इम्तिहान साबित होंगे।

क्या आप चाहेंगे कि मैं इस विस्तृत ओपिनियन को एक अधिक संरचित और औपचारिक संपादकीय लेख (Editorial Column) के प्रारूप में बदल दूँ, जिसमें एक आकर्षक शीर्षक, संक्षिप्त इंट्रो, प्रमुख उद्धरण और एक लेखक टिप्पणी शामिल हो?

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