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मिट्टी की चीख: रासायनिक नशे से जैविक जागरण तक – अब समय है धरती माँ को बचाने का

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नई दिल्ली 29 अक्टूबर 2025

आलोक रंजन, वरिष्ठ पत्रकार 

भारत की मिट्टियाँ, जो सदियों से हमारी सभ्यता की नींव रही हैं, आज एक गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी हैं – यह बात दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की नई रिपोर्ट से साफ़ झलकती है, जो सरकार की अपनी सॉइल हेल्थ कार्ड योजना के आँकड़ों पर आधारित है; रिपोर्ट बताती है कि देश भर से लिए गए मिट्टी के नमूनों में से 64 प्रतिशत में नाइट्रोजन की भारी कमी है, जबकि 48.5 प्रतिशत में जैविक कार्बन का स्तर बेहद कम है, और ये दोनों तत्व मिट्टी की उर्वरता, फसल उत्पादकता और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की क्षमता के लिए आधारभूत हैं।

 सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि भारत में पिछले कई दशकों से उर्वरकों का भारी-भरकम इस्तेमाल हो रहा है, फिर भी नाइट्रोजन युक्त उर्वरक डालने से मिट्टी में नाइट्रोजन नहीं बढ़ रहा, और एनपीके (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश) का कुल उपयोग भी जैविक कार्बन को बढ़ाने में असफल रहा है – यानी हम मिट्टी को दवा दे रहे हैं, लेकिन उसकी बीमारी बढ़ती जा रही है; यह स्थिति इसलिए और खतरनाक है क्योंकि जैविक कार्बन मिट्टी में पानी रोकने, सूक्ष्मजीवों को पनपने और कार्बन डाइऑक्साइड को वायुमंडल में जाने से रोकने का काम करता है, और रिपोर्ट के अनुसार भारतीय मिट्टियाँ हर साल 6 से 7 टेराग्राम कार्बन सोखने की क्षमता रखती हैं, जो जलवायु परिवर्तन के खिलाफ एक प्राकृतिक हथियार है, लेकिन जब यही मिट्टी कमजोर पड़ रही है, तो हम न सिर्फ़ अपनी खाद्य सुरक्षा को दाँव पर लगा रहे हैं, बल्कि ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा भी दे रहे हैं।

सॉइल हेल्थ कार्ड योजना, जो 2015 में शुरू हुई थी और 2023 से 2025 के बीच 1.3 करोड़ नमूनों की जाँच कर चुकी है, निश्चित रूप से एक सराहनीय कदम है, लेकिन यह आधा-अधूरा प्रयास साबित हो रहा है क्योंकि यह केवल 12 रासायनिक पैरामीटर पर केंद्रित है, जबकि मिट्टी का पूरा स्वास्थ्य भौतिक गुणों जैसे संरचना, जल धारण क्षमता और जैविक गतिविधियों जैसे केंचुए, माइक्रोबियल जीवन पर भी निर्भर करता है – अंतरराष्ट्रीय संगठन जैसे FAO का GLOSOLAN भी यही सलाह देता है कि होलिस्टिक मूल्यांकन के लिए सभी पहलुओं को शामिल करना ज़रूरी है।

 भारत में 14 करोड़ किसान परिवार हैं, लेकिन पिछले दो सालों में सिर्फ़ 1.1 करोड़ तक ही सॉइल कार्ड पहुँच पाए हैं, और जो पहुँचे भी, उनकी सलाह ज्यादातर रासायनिक उर्वरकों पर आधारित है, जिससे किसान उसी चक्र में फँसे रहते हैं; नीतिगत स्तर पर भी खामियाँ साफ़ हैं – जैविक खेती को बढ़ावा देने वाली योजनाएँ हैं, लेकिन उनका कवरेज नगण्य है, और बायोचार जैसे क्रांतिकारी समाधान, जो फसल अवशेषों को जलाने की बजाय पायरोलिसिस से कार्बन-समृद्ध चारकोल बनाता है, मिट्टी में नमी बनाए रखता है, उर्वरता बढ़ाता है और कार्बन सिंक का काम करता है, उसके लिए कोई मानकीकृत उत्पादन प्रोटोकॉल तक नहीं है।

अब सवाल यह है कि इस संकट से बाहर निकलने के लिए क्या किया जाए, और मेरा मानना है कि हमें एक क्रांतिकारी, बहु-आयामी और तत्काल कार्ययोजना की ज़रूरत है – सबसे पहले सॉइल हेल्थ कार्ड को “जीवंत मिट्टी कार्ड” में बदलना होगा, जिसमें भौतिक और जैविक पैरामीटर अनिवार्य हों, हर गाँव में मिनी-लैब हों, और डिजिटल ऐप से किसान को लाइव अपडेट मिले, ताकि तीन साल में 10 करोड़ किसानों तक यह पहुँच जाए। 

उर्वरक सब्सिडी का मॉडल पूरी तरह पलटना होगा – अभी 80 प्रतिशत सब्सिडी रासायनिक उर्वरकों पर है, जिसे घटाकर 50 प्रतिशत जैविक खाद और बायोचार पर शिफ़्ट करना चाहिए, साथ ही “उर्वरक कार्ड” सिस्टम लाकर हर खेत का डिजिटल रिकॉर्ड रखें, और कम रासायनिक इस्तेमाल करने वाले किसान को “मिट्टी बचाओ बोनस” के रूप में 2000 रुपये प्रति हेक्टेयर अतिरिक्त दें।

 बायोचार को “काला सोना” बनाने की ज़रूरत है – हर पंचायत में बायोचार यूनिट लगे, BIS मानक लागू हों, और 1 टन बायोचार के लिए 1 टन CO₂ कार्बन क्रेडिट मिले, जिसे किसान अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बेच सके, ताकि पाँच साल में 50 लाख हेक्टेयर में यह फैल जाए।

साथ ही, हमें “मिट्टी योद्धा” अभियान चलाना होगा – हर ब्लॉक में सॉइल क्लिनिक, जहाँ मुफ़्त जाँच और तुरंत सलाह मिले, स्कूलों में “मिट्टी विज्ञान” विषय अनिवार्य हो, जिसमें बच्चे केंचुए गिनना और माइक्रोबियल गतिविधि समझें, और महिला स्वयं सहायता समूहों को बायोचार, कम्पोस्ट और वर्मी-कल्चर की ट्रेनिंग देकर उन्हें मिट्टी सुधार की सेनानी बनाया जाए। नीतिगत स्तर पर नया मंत्र होना चाहिए – “जैविक पहले, रासायनिक अंतिम” – 2030 तक 25 प्रतिशत कृषि भूमि जैविक हो, रासायनिक उर्वरकों पर 10 प्रतिशत लग्ज़री टैक्स लगे जो जैविक फंड में जाए, और किसान उत्पादक संगठन (FPO) जैविक ब्रांड बनाकर प्रीमियम कीमत पर बेचें।

 यह सब सिर्फ़ तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक क्रांति है – हमें मिट्टी को “संपत्ति” नहीं, “जीवंत माँ” समझना होगा, और हर नागरिक, किसान, वैज्ञानिक और नीति-निर्माता को इस पुकार में शामिल होना होगा, क्योंकि अगर आज हमने मिट्टी बचाई, तो कल हमारी थाली में अन्न होगा, हवा में शुद्धता होगी, और आने वाली पीढ़ियाँ हमें आशीर्वाद देंगी – वरना 2050 तक आधी मिट्टी बंजर हो जाएगी, और हम इतिहास के पन्नों में “मिट्टी मारने वाली सभ्यता” के रूप में दर्ज हो जाएँगे। जय मिट्टी, जय किसान, जय हिंद!

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