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8वीं वेतन आयोग की मंजूरी: उम्मीदों का ऐलान या वित्तीय अनुशासन का जाल?

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नई दिल्ली, 28 अक्टूबर 2025

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंगलवार को केंद्रीय कैबिनेट ने 8वें केंद्रीय वेतन आयोग (CPC) की संदर्भ शर्तों (Terms of Reference – ToR) को मंजूरी दे दी। यह आयोग केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के वेतन, भत्तों और पेंशन से संबंधित ढांचे की समीक्षा करेगा। आयोग में एक चेयरपर्सन, एक पार्ट-टाइम सदस्य और एक सदस्य सचिव होंगे और यह अपने गठन की तारीख से 18 महीनों में रिपोर्ट देगा। यदि आवश्यकता हुई तो आयोग अंतरिम रिपोर्ट भी भेज सकेगा।

सरकार ने जनवरी 2025 में इस आयोग के गठन का ऐलान किया था। परंपरा के अनुसार हर दस वर्ष में वेतन आयोग गठित होता है, इसलिए 8वीं CPC की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से लागू होने की उम्मीद है। इस आयोग से देशभर के करीब 50 लाख केंद्रीय सरकारी कर्मचारी (रक्षा कर्मियों सहित) और 65 लाख से अधिक पेंशनर्स को लाभ होने की संभावना जताई जा रही है। पिछली यानी 7वीं CPC को मनमोहन सिंह सरकार ने फरवरी 2014 में गठित किया था, जिसकी सिफारिशें जनवरी 2016 से प्रभावी हुई थीं।

ToR के मुताबिक आयोग अपनी सिफारिशें तैयार करते समय देश की आर्थिक स्थिति, वित्तीय अनुशासन (फिस्कल प्रूडेंस), विकास व्यय और कल्याण योजनाओं के लिए संसाधनों की आवश्यकता, नॉन-कंट्रीब्यूटरी पेंशन योजनाओं का बोझ, राज्य सरकारों पर वित्तीय प्रभाव, तथा सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन-भत्तों की स्थिति को ध्यान में रखेगा। सरकार का दावा है कि यह कदम कर्मचारियों की वर्षों पुरानी मांग को पूरा करेगा, परंतु विशेषज्ञों का कहना है कि ToR की भाषा यह स्पष्ट संकेत देती है कि “फिस्कल प्रूडेंस” की आड़ में वेतन वृद्धि को सीमित रखने की नीति अपनाई जाएगी।

यह वही रास्ता है जो 7वीं वेतन आयोग में देखा गया था। तब सरकार ने “फिस्कल बैलेंस” का हवाला देते हुए फिटमेंट फैक्टर मात्र 2.57 रखा था, जिससे कर्मचारियों की औसत वेतन वृद्धि महंगाई दर के अनुरूप नहीं हो पाई। अब 8वीं CPC में भी वही चिंता झलक रही है। मौजूदा समय में देश की अर्थव्यवस्था मजबूत है—GDP ग्रोथ 7% से ऊपर अनुमानित है, और GST संग्रह हर महीने 1.7 लाख करोड़ रुपये के आसपास है—फिर भी वेतन वृद्धि को पीछे रखकर विकास व्यय को प्राथमिकता देना यह दिखाता है कि सरकार वेतन बढ़ोतरी को खर्च का बोझ मान रही है, न कि निवेश। इससे कर्मचारियों की वास्तविक आय (रीयल इनकम) घटने की संभावना है, जबकि महंगाई 5-6% के स्तर पर बनी हुई है।

ToR में एक और महत्वपूर्ण बिंदु राज्यों पर प्रभाव से जुड़ा है। केंद्र ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि राज्य सरकारें भी आमतौर पर केंद्र की सिफारिशों को अपनाती हैं, लेकिन इस प्रभाव के लिए कोई अतिरिक्त वित्तीय सहायता का प्रावधान नहीं किया गया। इसका मतलब यह है कि केंद्र अपने 50 लाख कर्मचारियों का बोझ तो उठाएगा, लेकिन देशभर के लगभग 2 करोड़ राज्य कर्मचारियों पर होने वाला खर्च उन्हीं राज्यों को वहन करना पड़ेगा, जो पहले से ही ₹80 लाख करोड़ से अधिक के कर्ज में डूबे हुए हैं। यह संघीय ढांचे (फेडरलिज़्म) के सिद्धांत के साथ अन्याय जैसा प्रतीत होता है। 7वीं CPC के दौरान भी कई राज्यों—जैसे पश्चिम बंगाल और केरल—को सिफारिशें लागू करने में वर्षों की देरी करनी पड़ी थी क्योंकि केंद्र ने कोई राहत फंड नहीं दिया था। परिणामस्वरूप, केंद्र और राज्य के बीच वेतन असमानता और राजनीतिक तनाव दोनों बढ़े।

पेंशन से जुड़ा पहलू भी ToR में विवादास्पद है। इसमें “नॉन-कंट्रीब्यूटरी” यानी पुरानी पेंशन योजनाओं (OPS) को “अनफंडेड बोझ” बताया गया है। जबकि देश के कई राज्यों ने OPS को बहाल करने की घोषणा कर दी है, केंद्र सरकार लगातार न्यू पेंशन स्कीम (NPS) पर टिके रहने की वकालत कर रही है। NPS पूरी तरह बाजार-आधारित है, जिससे रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली राशि अनिश्चित रहती है। ToR में OPS को फंडेड बनाने का कोई ठोस सुझाव नहीं है—सिर्फ यह चेतावनी दी गई है कि इसका बोझ भविष्य में बढ़ेगा। मौजूदा स्थिति में पेंशन व्यय GDP का 1.5% से अधिक है, यानी लगभग ₹2 लाख करोड़ सालाना। यदि कोई दीर्घकालिक फंडिंग योजना नहीं बनाई गई, तो आने वाले वर्षों में इसका भार करदाताओं और युवा पीढ़ी पर पड़ेगा।

एक और गंभीर प्रश्न ToR में PSU और प्राइवेट सेक्टर की तुलना का है। सरकार ने संकेत दिया है कि आयोग सरकारी कर्मचारियों के वेतन का मूल्यांकन करते समय इन दोनों सेक्टरों के वेतन ढांचे को भी देखेगा। यह तुलना सतही तौर पर तो तर्कसंगत लग सकती है, लेकिन व्यवहार में यह गलत पैमाना है। PSU में परफॉर्मेंस-बेस्ड वेतन होता है, जबकि प्राइवेट सेक्टर में नौकरी की स्थिरता नहीं होती। सरकारी नौकरी में सुरक्षा और सेवा की निरंतरता उसकी सबसे बड़ी ताकत है, जिसे केवल वेतन स्तर से नहीं मापा जा सकता। इस तुलना का इस्तेमाल अक्सर वेतन वृद्धि को कम ठहराने के लिए किया जाता है।

आयोग की समयसीमा को लेकर भी संदेह है। रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया है, लेकिन आयोग का गठन अभी हुआ भी नहीं है। 7वीं CPC में भी यही हुआ था—आयोग की रिपोर्ट आने और उसके लागू होने में दो साल लग गए थे। इस बार भी ToR मंजूर करने में नौ महीने की देरी हो चुकी है, इसलिए यह मानना कठिन है कि 2026 से पहले सिफारिशें लागू हो पाएंगी। कई जानकार इसे एक राजनीतिक रणनीति मान रहे हैं—जहां सरकार लोकसभा चुनाव के बाद 2026 के पहले वर्ष में वेतन आयोग को “लोकलुभावन तोहफे” के रूप में पेश कर सकती है।

अंततः यह स्पष्ट है कि 8वीं वेतन आयोग की संदर्भ शर्तें कर्मचारी हितों की तुलना में सरकार के वित्तीय अनुशासन और राजनीतिक समीकरणों को अधिक प्राथमिकता देती हैं। देश की आर्थिक मजबूती और उच्च राजस्व संग्रह के बावजूद यदि वेतन वृद्धि सीमित रखी गई, तो इससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ेगा और यूनियन आंदोलन तेज हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में कर्मचारी कल्याण चाहती है तो उसे फिटमेंट फैक्टर कम से कम 3.0 या उससे अधिक रखना चाहिए, पुरानी पेंशन योजना के लिए फंडिंग रोडमैप बनाना चाहिए और महंगाई-लिंक्ड संशोधन तंत्र को ToR में जोड़ना चाहिए। अन्यथा यह आयोग सिर्फ नाम का सुधार बनकर रह जाएगा—एक ऐसा आयोग जो कागज पर तो “वेतन वृद्धि” का वादा करता है, लेकिन असल में “वित्तीय कटौती” की नीतियों को और मजबूत करता है।

फिस्कल प्रूडेंस’ की आड़ में क्या दबा है सरकार का असली एजेंडा?

आयोग में एक चेयरपर्सन, एक पार्ट-टाइम सदस्य और एक सदस्य सचिव होंगे। यह गठन की तारीख से 18 महीनों में रिपोर्ट देगा, और आवश्यकता होने पर अंतरिम रिपोर्ट भी सौंप सकता है। सरकार ने जनवरी 2025 में आयोग गठित करने का संकेत दिया था। परंपरा के मुताबिक, हर 10 साल में वेतन आयोग बनता है, इसलिए 8वीं CPC की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से लागू होने की उम्मीद है। इससे 50 लाख केंद्रीय कर्मचारी (रक्षा कर्मियों सहित) और 65 लाख से अधिक पेंशनर्स लाभान्वित होंगे। 7वीं CPC को मनमोहन सिंह सरकार ने फरवरी 2014 में गठित किया था, जिसकी सिफारिशें जनवरी 2016 से लागू हुईं।

 ToR की हकीकत: ‘कर्मचारी हित’ बनाम ‘वित्तीय अनुशासन’

सरकार ने अपने दस्तावेज़ में साफ लिखा है कि आयोग सिफारिशें करते समय देश की आर्थिक स्थिति, फिस्कल प्रूडेंस (वित्तीय अनुशासन), विकास व्यय, सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए संसाधनों की आवश्यकता, राज्य सरकारों पर प्रभाव और प्राइवेट व PSU सेक्टर के वेतन ढांचे को ध्यान में रखेगा।

लेकिन यहीं से कहानी दिलचस्प — और संदिग्ध — हो जाती है।

 पोस्टमार्टम: ToR की गड़बड़ियां और नीतिगत विरोधाभास

फिस्कल प्रूडेंस का बहाना — वेतन वृद्धि को सीमित रखने की चाल

ToR में सबसे पहले “फिस्कल प्रूडेंस” को प्राथमिकता दी गई है। यानी, वित्त मंत्रालय की कसौटी पर कर्मचारी हितों की बलि चढ़ सकती है।

 तथ्य:

7वीं CPC में फिटमेंट फैक्टर 2.57 रखा गया था — जिससे वास्तविक वेतन वृद्धि महंगाई के मुकाबले नगण्य रही।

अब 8वीं CPC के ToR में भी वही स्वर दोहराया गया है।

विरोधाभास:

देश की GDP ग्रोथ 7%+, GST कलेक्शन ₹1.7 लाख करोड़/माह, और राजकोषीय स्थिति स्थिर मानी जा रही है।

फिर भी सरकार वेतन वृद्धि को “विकास व्यय” के पीछे धकेल रही है।

नतीजा: महंगाई 5-6% होने के बावजूद कर्मचारियों की वास्तविक आमदनी घटेगी।

राज्यों पर बोझ डालना — ‘फेडरलिज्म’ की धज्जियां

ToR में राज्य सरकारों पर असर को खासतौर पर रेखांकित किया गया है, क्योंकि वे केंद्र की सिफारिशें अपने-अपने स्तर पर लागू करती हैं।

 गड़बड़ी:

केंद्र 50 लाख कर्मचारियों पर खर्च करता है, लेकिन राज्यों के 2 करोड़ कर्मचारियों का बोझ उन्हीं पर डाल देता है।

राज्य पहले ही ₹80 लाख करोड़ से अधिक कर्ज में डूबे हैं।

उदाहरण:

7वीं CPC लागू करने में बंगाल, केरल जैसे राज्यों को वर्षों की देरी करनी पड़ी। केंद्र ने कोई राहत फंड नहीं दिया — बस “सलाह” थमा दी।

नतीजा: केंद्र-राज्य असमानता और तनाव दोनों बढ़े।

पेंशन का अनफंडेड बोझ — NPS बनाम OPS की उलझन

ToR में नॉन-कंट्रीब्यूटरी पेंशन स्कीमों (OPS) को “अनफंडेड बोझ” बताया गया है।

 गड़बड़ी:

कई राज्यों ने OPS (ओल्ड पेंशन स्कीम) बहाल करने की घोषणा की, पर केंद्र लगातार NPS (न्यू पेंशन स्कीम) पर जोर दे रहा है, जो बाजार पर निर्भर है। ToR में OPS को फंडेड बनाने का कोई ठोस प्रस्ताव नहीं है।

तथ्य:

पेंशन व्यय GDP का 1.5%+ (₹2 लाख करोड़ सालाना) है। यह लागत बढ़ रही है, लेकिन सरकार ने फंडिंग मैकेनिज्म तय नहीं किया।

नतीजा: भविष्य की पीढ़ियों पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा।

PSU और प्राइवेट सेक्टर से तुलना — गलत पैमाने पर नापना

ToR में सरकारी कर्मचारियों की सैलरी की तुलना PSU और प्राइवेट सेक्टर से की जाएगी।

गड़बड़ी:

PSU में परफॉर्मेंस-बेस्ड पे और बोनस सिस्टम है, जबकि सरकारी नौकरियों में सर्विस सिक्योरिटी और न्यूनतम रिस्क। इस तुलना का इस्तेमाल वेतन वृद्धि कम करने के औचित्य के रूप में किया जा सकता है।

 तथ्य:

PSU टॉप एग्जीक्यूटिव्स ₹1 करोड़+ सालाना कमाते हैं,

जबकि निचले कर्मचारी सरकारी साथियों से भी कम।

प्राइवेट सेक्टर में औसत वेतन भले ज्यादा है, पर नौकरी की स्थिरता नहीं।

समयसीमा और अंतरिम रिपोर्ट — ‘देरी की रणनीति’

आयोग को रिपोर्ट देने के लिए 18 महीने दिए गए हैं, लेकिन अभी केवल ToR ही मंजूर हुआ है।

गड़बड़ी:

7वीं CPC में भी यही हुआ — रिपोर्ट और लागू होने में दो साल लग गए। अब 8वीं CPC की सिफारिशें भी 2026 से पहले लागू होती नहीं दिखतीं।

राजनीतिक संदर्भ:

जनवरी 2025 में घोषणा, अक्टूबर में ToR मंजूरी — यानी 9 महीने की देरी। यह देरी 2026 के चुनावी मौसम में “घोषणाओं का तोहफा” बन सकती है।

 ‘कर्मचारी हितैषी आयोग’ या ‘कागजी शेर’?

8वीं CPC की Terms of Reference यह दर्शाती हैं कि सरकार कर्मचारी कल्याण की बजाय वित्तीय संयम और चुनावी रणनीति को प्राथमिकता दे रही है।

देश की आर्थिक मजबूती के बावजूद यदि वेतन वृद्धि सीमित रखी गई तो इससे असंतोष, यूनियन आंदोलन और उत्पादकता में गिरावट तय है।

सुझाव:

फिटमेंट फैक्टर कम से कम 3.0 या उससे अधिक तय किया जाए।

OPS के लिए चरणबद्ध फंडिंग रोडमैप तैयार किया जाए।

ToR में पारदर्शी महंगाई-लिंक्ड वेतन संशोधन तंत्र जोड़ा जाए।

अन्यथा यह आयोग केवल “कर्मचारी उम्मीदों का मृगतृष्णा” बनकर रह जाएगा — एक ऐसा आयोग, जो नाम में ‘वेतन वृद्धि’ है, पर नीति में ‘फिस्कल कटौती’।

 

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