नई दिल्ली 28 अक्टूबर 2025
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स (X) पर प्रधानमंत्री कार्यालय को निशाने पर लेते हुए एक बेहद तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय इंजीनियर अपने अमेरिकी समकक्षों से 85% कम वेतन पाते हैं और यही कारण है कि देश के टैलेंटेड युवा लगातार विदेश पलायन कर रहे हैं। मगर, अब जब ट्रंप प्रशासन की “अमेरिका फर्स्ट” नीति ने H-1B वीजा पर शिकंजा कस दिया है, तो न विदेश में जगह बची है, न देश में अवसर। खेड़ा ने व्यंग्य करते हुए लिखा — “सरकार की चाणक्य नीति देखिए: न घर में रोजगार बनाया, न बाहर जाकर युवाओं के हितों की रक्षा की। बहुत खूब।
वेतन में 85% का अंतर: आंकड़े बोलते हैं
भारत और अमेरिका के इंजीनियरों की आय में जमीन-आसमान का फर्क है। भारत में एक औसत सॉफ्टवेयर इंजीनियर सालाना ₹5.6 से ₹8 लाख कमाता है (यानी लगभग $6,700 से $9,500)। वहीं, अमेरिका में यह औसत वेतन $118,000 से $148,000 सालाना है, यानी लगभग ₹1 से ₹1.2 करोड़। ये अंतर 85 से 94% तक का है।
भले ही भारत में क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर यह फर्क थोड़ा कम दिखे, लेकिन नकद आय के लिहाज से यह एक गहरी खाई है। यही कारण है कि आज भी लाखों भारतीय पेशेवर विदेश में काम करके रेमिटेंस भेजते हैं, जो 2023 में $119 बिलियन तक पहुंच गया — यानी पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक सहारा।
ब्रेन ड्रेन का कड़वा सच
भारत हर साल लगभग 15 लाख इंजीनियर पैदा करता है, मगर उनमें से एक बड़ा हिस्सा अपने हुनर का उपयोग देश में नहीं कर पाता। बेरोजगारी दर 8-10% के बीच झूलती रहती है, और जो नौकरी करते भी हैं, उनकी तनख्वाह उनकी योग्यता से मेल नहीं खाती।
वर्तमान में 10 लाख से अधिक भारतीय मूल के इंजीनियर और वैज्ञानिक अमेरिका में कार्यरत हैं। H-1B वीजा का लगभग 71% हिस्सा भारतीयों के पास है। लेकिन ट्रंप प्रशासन की नई नीतियों ने इस मार्ग को लगभग बंद कर दिया है।
FY2024 में करीब 4 लाख H-1B अप्रूवल हुए, जिनमें से अधिकतर रिन्यूअल केस थे — यानी नए आवेदकों के लिए अवसर घटते जा रहे हैं।
ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट” नीति: भारतीय युवाओं के लिए झटका
सितंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने H-1B वीजा नीति में बड़ा बदलाव किया। अब नई पेटिशन पर $100,000 तक की फीस लगाई गई है, जबकि पहले यह $2,000-$5,000 के बीच थी।
नई नीति के तहत केवल उच्च वेतन और अत्यधिक कुशल उम्मीदवारों को ही प्राथमिकता दी जाएगी, और ऑफशोरिंग जॉब्स पर सख्त रोक लगाई गई है।
इससे भारतीय पेशेवरों के लिए न सिर्फ वीजा हासिल करना कठिन हो गया है, बल्कि ग्रीन कार्ड बैकलॉग भी 10 से 20 साल तक बढ़ गया है। नतीजतन, कई भारतीय युवा अब कनाडा, यूरोप या भारत में ही रहना पसंद कर रहे हैं।
खेड़ा का तंज या यथार्थ की झलक?
पवन खेड़ा का व्यंग्य भले ही राजनीतिक हो, मगर उसके भीतर सच्चाई की परतें छिपी हैं। उन्होंने कहा कि सरकार जानबूझकर इंजीनियरों को देश से बाहर भेजती है, ताकि घरेलू रोजगार संकट पर पर्दा डाला जा सके।
वहीं, केंद्र सरकार का दावा है कि 2019 से अब तक 25 लाख IT और सर्विस सेक्टर की नौकरियां बनी हैं। Startup India, Skill India और Digital India जैसे अभियानों को भी सरकार अपनी सफलता की मिसाल बताती है।
लेकिन जमीन पर तस्वीर अलग है। 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी 23% से ऊपर है। सॉफ्टवेयर और इंजीनियरिंग सेक्टर की सैलरी कई वर्षों से लगभग स्थिर है। ऐसे में कांग्रेस ने इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना लिया है, खासकर 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले।
आगे का रास्ता: संकट या नया अवसर?
विदेश में अवसर घटने का नुकसान तो है, लेकिन एक सकारात्मक पहलू भी उभर रहा है। अब भारतीय IT कंपनियां (जैसे TCS, Infosys, Wipro) घरेलू स्तर पर भर्ती बढ़ा रही हैं। साथ ही, रिमोट वर्क कल्चर ने भारतीय इंजीनियरों को घर बैठे ही $70,000-$84,000 सालाना की आय अर्जित करने का मौका दिया है।
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह “ब्रेन ड्रेन” से “ब्रेन सर्कुलेशन” की ओर एक संकेत है — जहां भारत में रहकर ही युवा वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन अगर सरकार ने शिक्षा, रोजगार और नवाचार के अवसर नहीं बढ़ाए, तो यह “ब्रेन सर्कुलेशन” भी अंततः “ब्रेन वेस्ट” बन जाएगा।
पवन खेड़ा का हमला केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की आह है जो योग्यता और अवसर के बीच फंसी हुई है। जहां एक ओर अमेरिका का दरवाजा बंद होता जा रहा है, वहीं भारत के भीतर अवसर सीमित हैं।
क्या यह दौर देश को नए आत्मनिर्भर भारत की ओर ले जाएगा या निराश युवाओं की हताशा में बदल जाएगा — यह आने वाले वर्षों में तय होगा।




